इथेनॉल की बढ़ती मांग भी नहीं बचा सकी मक्का? एक साल में 6.59 लाख हेक्टेयर घटी बुवाई

इथेनॉल की बढ़ती मांग भी नहीं बचा सकी मक्का? एक साल में 6.59 लाख हेक्टेयर घटी बुवाई

देश में इथेनॉल उत्पादन और E20 ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए मक्के की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन किसानों का इस फसल से मोहभंग होता दिख रहा है. कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार खरीफ 2026 में मक्के की बुवाई पिछले साल के मुकाबले 6.59 लाख हेक्टेयर घट गई है. कमजोर दाम, MSP में सीमित बढ़ोतरी और मौसम की चुनौतियों के कारण किसान दूसरी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं.

Advertisement
इथेनॉल की बढ़ती मांग भी नहीं बचा सकी मक्का? एक साल में 6.59 लाख हेक्टेयर घटी बुवाईइथेनॉल के बावजूद मक्के का दाम सही नहीं

देश में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने और E20 टारगेट को आगे बढ़ाने के लिए सरकार मक्के को प्रमुख कच्चा माल (फीडस्टॉक) के रूप में बढ़ावा दे रही है. इसके बावजूद खेतों में तस्वीर इसके ठीक उलट दिखाई दे रही है. कृषि मंत्रालय के ताजा खरीफ रकबा आंकड़े बताते हैं कि चालू खरीफ सीजन में मक्का किसानों की पसंदीदा फसल नहीं रह गई है. अब किसानों का मक्के से मोहभंग हो रहा है क्योंकि उन्हें उचित सरकारी रेट नहीं मिल रहे हैं.

31 जुलाई 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में मक्के की बुवाई 83.56 लाख हेक्टेयर में हुई है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 90.15 लाख हेक्टेयर थी. यानी एक साल में 6.59 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल कम हो गया है.

यह गिरावट ऐसे समय पर आई है जब इथेनॉल इंडस्ट्री में मक्के की खपत तेजी से बढ़ रही है और सरकार भी चावल के विकल्प के तौर पर मक्के के उपयोग को बढ़ावा दे रही है.

किसानों को क्यों नहीं दिख रहा फायदा?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इथेनॉल इंडस्ट्री की मांग बढ़ने का लाभ सीधे किसानों तक नहीं पहुंच पाया है. कई राज्यों में किसानों को उचित बाजार मूल्य नहीं मिल रहा है. MSP में बढ़ोतरी की रफ्तार भी किसानों की अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं रही. उत्पादन लागत, सिंचाई खर्च और मौसम संबंधी जोखिम बढ़ने के बीच किसान उन फसलों की ओर झुकाव दिखा रहे हैं जिनमें बेहतर लाभ की संभावना दिखाई दे रही है. इसी का असर खरीफ सीजन के रकबे में साफ दिखाई दे रहा है.

केवल मक्का ही नहीं, कई खरीफ फसलों का रकबा घटा

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 31 जुलाई 2026 तक कुल खरीफ बुवाई 894.22 लाख हेक्टेयर में हुई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 920.72 लाख हेक्टेयर थी. यानी कुल बुवाई क्षेत्र में 26.50 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है.

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन में कई प्रमुख फसलों का रकबा पिछले साल के मुकाबले घटा है. धान की बुवाई 308.39 लाख हेक्टेयर से घटकर 301.49 लाख हेक्टेयर रह गई है, यानी 6.89 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई. इसी तरह दलहन का रकबा 101.60 लाख हेक्टेयर से घटकर 95.18 लाख हेक्टेयर रह गया, जो 6.41 लाख हेक्टेयर की गिरावट को दर्शाता है.

मोटे अनाज और श्री अन्न का कुल रकबा भी 170.60 लाख हेक्टेयर से घटकर 157.77 लाख हेक्टेयर पर आ गया है, जिसमें 12.83 लाख हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई. इस श्रेणी में सबसे बड़ी चिंता मक्के की खेती को लेकर है, जिसका रकबा पिछले साल के 90.15 लाख हेक्टेयर से घटकर 83.56 लाख हेक्टेयर रह गया है.

तिलहन फसलों का बढ़ा रकबा

हालांकि सभी फसलों की स्थिति खराब नहीं है. तिलहन फसलों का कुल रकबा 171.13 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 172.32 लाख हेक्टेयर हो गया है. इसी तरह गन्ने का रकबा 56.72 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 57.58 लाख हेक्टेयर और जूट और मेस्टा का क्षेत्रफल 6.21 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 6.33 लाख हेक्टेयर हो गया है. तिलहन फसलों में खास तौर पर मूंगफली और तिल की बुवाई बढ़ी है, जिससे संकेत मिलता है कि कुछ इलाकों में किसानों ने बेहतर बाजार और मांग वाली फसलों को प्राथमिकता दी है.

धान

2026: 301.49 लाख हेक्टेयर
2025: 308.39 लाख हेक्टेयर
कमी: 6.89 लाख हेक्टेयर

दलहन

2026: 95.18 लाख हेक्टेयर
2025: 101.60 लाख हेक्टेयर
कमी: 6.41 लाख हेक्टेयर

मोटे अनाज और श्री अन्न

2026: 157.77 लाख हेक्टेयर
2025: 170.60 लाख हेक्टेयर
कमी: 12.83 लाख हेक्टेयर

इसी श्रेणी के भीतर मक्का की बुवाई में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है.

किन फसलों में बढ़ा रकबा?

तिलहन

2026: 172.32 लाख हेक्टेयर
2025: 171.13 लाख हेक्टेयर
बढ़ोतरी: 1.19 लाख हेक्टेयर

गन्ना

2026: 57.58 लाख हेक्टेयर
2025: 56.72 लाख हेक्टेयर
बढ़ोतरी: 0.86 लाख हेक्टेयर

जूट और मेस्टा

2026: 6.33 लाख हेक्टेयर
2025: 6.21 लाख हेक्टेयर
बढ़ोतरी: 0.12 लाख हेक्टेयर

तिलहन फसलों में मूंगफली और तिल का रकबा बढ़ा है, जिससे लगता है कि कुछ क्षेत्रों में किसानों ने बेहतर बाजार संभावनाओं वाली फसलों को प्राथमिकता दी है.

मौसम भी बना बड़ी चुनौती

इस खरीफ सीजन में मॉनसून की बारिश एक समान नहीं रही है. कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई, जबकि कुछ क्षेत्रों में बहुत अधिक बारिश और बाढ़ की स्थिति बनी. ऐसे हालात में किसानों ने जोखिम को देखते हुए बुवाई के फैसले बदले हैं.

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान को इथेनॉल ब्लेंडिंग से वाकई लाभ पहुंचाना है तो केवल उद्योग की मांग बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए MSP, खरीद व्यवस्था, प्रोसेसिंग इंडस्ट्री और बाजार तक पहुंच को भी मजबूत करना होगा. अन्यथा इथेनॉल प्रोग्राम के विस्तार के बावजूद मक्के का रकबा घटने का सिलसिला जारी रह सकता है.

POST A COMMENT