पंजाब में धान की बुवाई पर हंगामा जारी पंजाब सरकार के धान की बुवाई को बढ़ाने के फैसले ने हलचल मचाकर रख दी है. विशेषज्ञ तो इस पर मुख्यमंत्री भगवंत मान को आगाह कर ही चुके हैं, अब किसान संगठन भी इस फैसले के खिलाफ आ गए हैं. पंजाब सरकार की तरफ से धान की बुवाई की तारीख आगे बढ़ाने के कदम का विरोध कृषि विशेषज्ञ, पर्यावरण एक्टिवस्ट्सि और कृषि अर्थशास्त्रियों के अलावा कई किसान यूनियनों ने भी किया है. किसान यूनियनों की तरफ से राज्य में तेजी से घटते भूजल स्तर के बारे में चिंता जताई गई है.
पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) सरकार की तरफ से धान की बुवाई की तारीख 15 जून से बढ़ाकर 1 जून करने का फैसला किया गया है. एडवोकेट एचसी अरोड़ा की तरफ से आज इस फैसले के बाबत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में एक याचिका दायर की गई है. अखबार द ट्रिब्यून के अनुसार याचिका में राज्य सरकार को इस निर्णय को लागू करने के खिलाफ निर्देश देने की मांग की गई है. केंद्रीय भूजल बोर्ड के ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि 59.17 प्रतिशत क्षेत्र में जल स्तर में 0-2 मीटर की गिरावट आई है. 0.08 प्रतिशत क्षेत्र में 2-4 मीटर की गिरावट देखी गई है और 1 प्रतिशत से कम क्षेत्र में 4 मीटर से अधिक की गिरावट देखी गई है. ये आंकड़ें इस साल जनवरी में जारी किए गए थे.
संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ नेता बलबीर सिंह राजेवाल की मानें तो भूजल में कमी राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती है. राजेवाल की मानें तो भूजल में कमी की मौजूदा दर से दूसरे जल स्त्रोत एक साल में ही सूख जाएंगे. कई स्टडीज में भी यह बात सामने आई है कि दूसरे स्त्रोतों में सीसा और आर्सेनिक का स्तर मान्य स्तर से ज्यादा है जिससे यह पीने या खेती में प्रयोग के लिए अनुपयुक्त हो जाता है. धान की बुवाई को समय से पहले करने के फैसले के परिणाम बहुत बड़े हैं. यह सरकार का एक अदूरदर्शी दृष्टिकोण है.
भारतीय किसान यूनियन (एकता दकौंडा) ने अपने सदस्यों से कहना शुरू कर दिया है कि वे इस फैसले से प्रभावित न हों और कम से कम 10 जून तक इंतजार करें. यूनियन के महासचिव जगमोहन सिंह पटियाला ने कहा कि सरकार के इस कदम से किसानों को कोई फायदा नहीं होगा. उनका कहना है कि जब सरकारें सत्ता में तीन साल पूरे करती हैं तो वे इस बात का एहसास किए बिना इस तरह के तर्कहीन और लोकलुभावन फैसले लेती हैं कि भविष्य में राज्य के किसानों और कृषि अर्थव्यवस्था को कितना नुकसान उठाना पड़ेगा. एसकेएम (गैर-राजनीतिक) के नेता सरवन सिंह पंधेर ने कहा कि समय की मांग है कि कृषि विविधीकरण के लिए एक नीति बनाई जाए जिससे किसानों को पानी की अधिक खपत करने वाली धान की फसल से दूर किया जा सके.
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