विदर्भ में तूर के भाव में उछालमहाराष्ट्र में विदर्भ के अमरावती और अकोला जिले में इस खरीफ सीजन में कपास और सोयाबीन के बाद अब अरहर (तूर) ने भी किसानों को राहत दी है. सीजन के शुरुआती दौर में ही तूर के बाजार भाव समर्थन मूल्य से ऊपर पहुंचने से किसानों के चेहरे खिल उठे हैं. अकोला कृषि उपज मंडी समिति में तूर का अधिकतम भाव 9,150 रुपये प्रति क्विंटल दर्ज किया गया. सरकार द्वारा घोषित 8,000 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की तुलना में किसानों को करीब 1,000 रुपये से अधिक का भाव मिल रहा है.
इसी तरह सोयाबीन में भी तेजी देखने को मिल रही है. सोयाबीन का हमी भाव 5,328 रुपये होने के बावजूद बाजार में इसका भाव 5,571 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गया है. खरीफ सीजन की शुरुआत में ही तूर और सोयाबीन—दोनों फसलों के दाम बढ़ने से किसानों को बड़ी राहत जरूर मिली है, लेकिन दूसरी ओर यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि अब जबकि अधिकांश किसानों ने पहले ही अपनी उपज बेच दी है, तो इन बढ़े हुए दामों का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, इस वर्ष मराठवाड़ा और विदर्भ के कई हिस्सों में खरीफ सीजन के दौरान बारिश का स्वरूप असंतुलित रहा. कहीं अत्यधिक वर्षा से फसल को नुकसान हुआ, तो कहीं लंबे समय तक बारिश नहीं होने से तूर की बढ़वार प्रभावित हुई. इसका सीधा असर तूर के उत्पादन पर पड़ा है. बाजार में नई तूर की आवक अनुमान से काफी कम बनी हुई है.
इसके अलावा, पिछले वर्ष तूर को लगातार कम भाव मिलने के कारण अनेक किसानों ने इस बार तूर का रकबा घटाकर दूसरी फसलों की ओर रुख किया था. इसका परिणाम यह हुआ कि इस वर्ष कुल उत्पादन सीमित रह गया है.
दूसरी ओर, दाल उद्योगों की ओर से तूर की मांग लगातार बनी हुई है. आने वाले त्योहारों के मद्देनजर दालों की खरीद में तेजी आई है. इससे मंडियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी और तूर के भावों में उछाल देखने को मिला.
फिलहाल किसानों के पास भंडारण में रखा हुआ सोयाबीन बेहद कम बचा है. बाजार में आवक घटने से सोयाबीन के दामों को भी सहारा मिला है. व्यापारियों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोयाबीन तेल के भाव में सुधार, देश के क्रशिंग प्लांट्स से बढ़ी मांग, डीओसी (डिऑयल्ड केक) के अंतरराष्ट्रीय दामों में तेजी और नाफेड द्वारा समर्थन मूल्य पर की जा रही खरीद के कारण सोयाबीन के भाव मजबूत बने हुए हैं.
तूर के बाजार भाव (रुपये प्रति क्विंटल)
19 जनवरी – 6,750 से 7,451
21 जनवरी – 7,000 से 7,651
23 जनवरी – 7,100 से 8,161
28 जनवरी – 7,750 से 8,750
30 जनवरी – 7,600 से 9,150
31 जनवरी – 7,650 से 8,671
देश में तूर की मांग पूरी करने के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहना पड़ता है, खासकर अफ्रीकी देशों से. इस वर्ष म्यांमार, तंजानिया और मोजाम्बिक जैसे प्रमुख उत्पादक देशों में तूर के उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इसके चलते भारत में तूर का आयात सीमित रहने की संभावना जताई जा रही है. साथ ही सस्ती आयातित तूर मिलने की उम्मीद भी कमजोर हुई है.
व्यापारियों के अनुसार, कर्नाटक और मराठवाड़ा के कई इलाकों में भी तूर की औसत पैदावार घटने से घरेलू आपूर्ति पर असर पड़ा है, जिससे बाजार भाव और मजबूत हुए हैं.
अकोला के व्यापारी विशाल तोष्णीवाल ने कहा, “देश में तूर का उत्पादन इस बार कुछ हद तक कम रहने की संभावना है. अफ्रीकी देशों में भी पैदावार घटने से आयात सीमित रहेगा. बाजार में आवक कम है, इसी कारण फिलहाल तूर के दामों में तेजी बनी हुई है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि तूर और सोयाबीन के भावों में आई तेजी किसानों के लिए सकारात्मक संकेत है. हालांकि जमीनी हकीकत यह भी है कि अधिकांश छोटे और मध्यम किसानों ने अपनी फसल पहले ही कम दामों पर बेच दी थी. अब जब बाजार में भाव तेज हुए हैं, तब मंडियों में माल की उपलब्धता सीमित होने से बढ़े हुए दामों का वास्तविक लाभ कुछ ही किसानों और व्यापारिक वर्ग तक सिमटने की आशंका जताई जा रही है.
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