केंद्र ने 5 महीने के लिए कपास आयात शुल्क हटाया (फाइल फोटो)आत्मनिर्भर भारत' का नारा देने वाली सरकार का असली चेहरा एक बार फिर बेनकाब हो गया है, जहां देश के हाड़-मांस गलाने वाले किसान की लाठी कमजोर और रसूखदार कपड़ा मिलों की तिजोरी भारी पड़ गई है. सरकार ने एक बेहद चौंकाने वाले फैसले के तहत आगामी 1 जून से 31 अक्टूबर 2026 तक विदेशी कपास (कॉटन) के आयात पर लगने वाली 11 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी को पूरी तरह से हटाकर जीरो कर दिया है. यह सिर्फ एक टैक्स कटौती नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों कपास उत्पादक किसानों पर सीधा प्रहार है.
जब देश का अन्नदाता घाटे में डूबकर रो रहा था, तब सरकार बहरी बनी रही, लेकिन जैसे ही टेक्सटाइल कंपनियों के मुनाफे पर जरा सी आंच आई, सरकार ने आनन-फानन में विदेशी कपास के लिए भारत में रेड कारपेट बिछा दिए. यह नीतिगत वज्रपात भारतीय मंडियों को तबाह करने और अमेरिकी किसानों की जेबें भरेगा.
सरकार ने पिछले साल भी अगस्त से दिसंबर 2025 के बीच आयात शुल्क हटाकर देश के कॉटन बेल्ट को बर्बाद किया था और अब वही आत्मघाती इतिहास फिर दोहराया जा रहा है. लगातार मिल रहे धोखे और घाटे के कारण देश में कपास की खेती का रकबा पिछले 5 सालों में 135 लाख हेक्टेयर से घटकर केवल 115 लाख हेक्टेयर रह गया है.
जो देश कभी कपास का सिरमौर था, वहां का कुल कपास उत्पादन 336 लाख गांठों के स्तर से गिरकर अब महज 280 लाख गांठों के खतरनाक मोड़ पर आ चुका है. खेती सिमट रही है. सरकार नारे लगा रही है आत्मनिर्भर भारत के, लेकिन काम कर रही है आयात निर्भर बनाने का.
चालू सीजन में भारत का कॉटन आयात बढ़कर 50 लाख गांठ तक पहुंचने की उम्मीद है, जो भारतीय मंडियों और स्थानीय व्यापारियों को पूरी तरह क्रैश कर देगा. अब एक बार फिर जीरो इंपोर्ट ड्यूटी करने से टेक्सटाइल इंडस्ट्री का मुनाफा बढ़ जाएगा, लेकिन देश में कपास की खेती के हालात और खराब होंगे.
भारत सरकार के इस फैसले से देश के किसान को भले ही घाटा सहना पड़े की कगार पर पहुंचना पड़े, लेकिन अमेरिका, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया के कपास उत्पादकों की जेबें जमकर भरेंगी. जब घाटे के कारण भारतीय किसान कपास उगाना बंद कर देगा, तब यही विदेशी सप्लायर्स पूरे भारतीय बाजार पर एकाधिकार जमाकर मनमाने दाम वसूलेंगे.
शेतकरी संगठन के संस्थापक सदस्य विजय जावंधिया का खुला आरोप है कि सरकार को केवल बड़े उद्योगपतियों के मुनाफे की चिंता है. देश के अन्नदाता के हितों की बलि चढ़ाना इस व्यवस्था का परमानेंट कैरेक्टर बन चुका है. अब एक बार फिर किसान कपास की एमएसपी के लिए भी तरसेगा. सरकार ने जीरो इंपोर्ट ड्यूटी का फैसला टेक्सटाइल मिलों की लॉबी के दबाव में लिया है.
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