
पोल्ट्री एक्सपर्ट की मानें तो अंडे और चिकन के फार्म में सबसे ज्यादा लागत फीड पर आती है. और फीड में सबसे बड़ा हिस्सा होता है मक्का और सोयामील का. लेकिन पूरे साल मक्का और सोयामील के दाम ऊपर-नीचे होते रहते हैं. जिसका नुकसान पोल्ट्री फार्मर को उठाना पड़ता है. इसी के चलते पोल्ट्री फार्मर लगातार विदेश से मक्का और सोयामील इंपोर्ट करने की मांग करते रहते हैं. कुछ का कहना है कि विदेशों से जीएम मक्का और सोया आएगी तो हम सस्ते पोल्ट्री प्रोडक्ट एक्सपोर्ट कर सकेंगे.
वहीं कुछ ऐसे भी हैं जो देश में भी जीएम मक्का और सोया उगाने की बात कह रहे हैं. लेकिन जैसे ही चर्चा अमेरिका से चिकन लेग पीस इंपोर्ट होने की बात आती है तो पोल्ट्री सेक्टर चुप्पी साध जाता है. लेकिन किसान की मक्का और सोया मंगाने को तैयार हैं. गौरतलब रहे भारत और अमेरिका के बीच हुई कारोबारी डील में मक्का और सोयामील की भी चर्चा हो रही है.
पोल्ट्री फार्मर ने किसान तक से बातचीत में बताया कि अमेरिका में चिकन लेग पीस की डिमांड कम है. वहां चिकन के दूसरे पार्ट ज्यादा खाए जाते हैं. इसलिए वहां के बाजार में लेग पीस बहुत बचता है. अमेरिका में लोग ब्रेस्ट पीस खाना ज्यादा पसंद करते हैं. हालांकि लेग पीस में भी बहुत प्रोटीन होता है, लेकिन इसमे फैट की मात्रा भी ठीक-ठाक होती है, इसलिए अमेरिकन लेग पीस खाना पसंद नहीं करते हैं.
हालांकि अभी इस बात की उम्मीद कम है कि भारत पोल्ट्री प्रोडक्ट पर टैरिफ कम करेगा. क्योंकि सरकार हमेशा से किसानों के हित के बारे में सोचती आई है. हालांकि अभी भी अमेरिका के पोल्ट्री कारोबारियों की पहली कोशिश यही होती है कि चिकन के बचे हुए लेग पीस को कैसे बेचा जाए.
पोल्ट्री एक्सपर्ट का कहना है कि देश में हर महीने 40 करोड़ मुर्गे खाए जाते हैं. चूजे (चिक्स) बेचने वाली कंपनियां हर महीने ब्रॉयलर पोल्ट्री फार्मर को 40 करोड़ चूजे बेचते हैं. 35 से 40 दिन बाद यही चूजे बाजार में बेचने लायक बड़े हो जाते हैं. देश में करीब पांच लाख पोल्ट्री फार्मर ऐसे हैं जो चिकन के लिए चूजे पालते हैं. एक फार्म पर एवरेज पांच कर्मचारी काम करते हैं.
इसके लिए फार्म में फीड सप्लाई करने वाली कंपनियां, दवाई और फार्म में इस्तेमाल होने वाले उपकरण बनाने वाली कंपनियां, फीड के लिए मक्का, बाजरा और दूसरे आइटम बेचने वाले. चिकन की ट्रेडिंग और बिक्री करने वालों को मिला लें तो करीब दो से ढाई करोड़ लोग सीधे तौर पर ब्रॉयलर पोल्ट्री फार्म से जुड़े होते हैं.
पोल्ट्री एक्सपर्ट का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन में मक्का की बढ़ती खपत पोल्ट्री सेक्टर में चिंता बढ़ा रही है. असल बात तो ये है कि भारत का 4 करोड़ टन (एमटी) सालाना मक्का उत्पादन पोल्ट्री सेक्टर के साथ-साथ देश की खाद्य सुरक्षा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत ने 7 लाख टन से ज्यादा पोल्ट्री प्रोडक्ट का निर्यात किया गया था, जिसकी कुल कीमत करीब 12 सौ करोड़ रुपये थी.
ये एक्सपोर्ट कुल 64 देशों को किया गया था. पोल्ट्री में भारत सबसे ज्यादा अंडे और अंडे के पाउडर का निर्यात करता है, जबकि बहुत ही कम मात्रा में चिकन सिर्फ कुछ पड़ोसी देशों को निर्यात किया जाता है. लेकिन हमे इस वक्त पोल्ट्री सेक्टर में रेडी टू ईट और रेडी टू कुक पर ध्यान देना होगा. लेकिन इस सब के लिए बढ़ी हुई मात्रा के साथ पोल्ट्री फीड की जरूरत भी पड़ेगी.
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