प्रतीकात्मक फोटो: समुद्री शैवाल की खेती.देश ही नहीं विदेशों में भी समुद्री शैवाल (See Weed) का एक बड़ा बाजार है. लेकिन जरूरत है इसकी खेती के लिए मछुआरों को जागरुक करने के साथ ही बढ़ावा दिया जाए. एक सरकारी आंकड़े के मुताबिक अभी देश में बहुत कम लोग इसकी खेती कर रहे हैं. लेकिन अब केन्द्र सरकार चाहती है कि सीवीड की खेती के लिए अच्छे बीज और जर्मप्लाज्म को इंपोर्ट किया जाए. जिससे और ज्यादा से ज्यादा लोग इसकी खेती से जुड़ सकें. केन्द्रीय मत्स्य पालन विभाग के ज्वाइंट सेक्रेटरी सागर मेहरा का कहना है कि सीवीड का इस्तेमाल आज बड़े पैमाने पर खाद्य, ऊर्जा, रसायन और दवा उद्योग के साथ पोषण, बायोमेडिकल और पर्सनल केयर प्रोडक्ट में हो रहा है.
यही वजह है कि योजना के तहत सीवीड इंपोर्ट को लेकर राह आसान बनाई जा रही है. जैसे सीवीड के आयात के लिए चार सप्ताह के भीतर आयात परमिट जारी किया जाएगा. ऐसा होने से किसानों को उत्तम बीज स्टॉक मिल सकेगा. सरकार की कोशिश है कि साल 2025 तक देश में सीवीड का उत्पादन 10 लाख टन से ज्यादा हो जाए. गौरतलब रहे भारत में अभी सीवीड उद्यमों को व्यावसायिक रूप से महंगी प्रजातियों के लिए पर्याप्त मात्रा में बीज की उपलब्धता और सीवीड की एक खास प्रचलित प्रजाति कप्पाफाइकस के बीज की क्वालिटी के लिए चुनौती का सामना करना पड़ता है.
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सागर मेहरा का कहना है कि सीवीड को लेकर साल 2025 तक के लिए तय किए गए टॉरगेट को हासिल करने के लिए जोर-शोर से काम चल रहा है. इसी कड़ी में करीब 127 करोड़ रुपये से बहुउद्देशीय सीवीड पार्क की स्थापना की गई है. वहीं नए प्लान के तहत सीवीड की नई किस्मों के इंपोर्ट होने से रिसर्च और डवलपमेंट को भी बढ़ावा मिलेगा, जिससे लाल, भूरे और हरे शैवाल का उत्पादन बढ़ेगा. ऐसा होने पर प्रोसेसिंग यूनिट को भी कारोबार मिलेगा.
सागर मेहरा ने बताया कि पाक खाड़ी के गांव मुनईकाडु में मछुआरे सीवीड की खेती कर रहे हैं. हाल ही में हम लोगों ने मुनईकाडु गांव के किसानों से मुलाकात की थी. इस वक्त देश में करीब 1500 परिवार सीवीड की खेती में लगे हुए हैं. सीवीड का मौजूदा सालाना उत्पादन करीब पांच हजार टन प्रति हेक्टेयर है. हालांकि नीति और तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन को और कई गुना बढ़ाया जा सकता है.
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