
बकरी पालन अब शहर में भी मुमकिन हो गया है. बकरियों के लिए जगह, खाने के लिए चारा अब कोई परेशानी नहीं रहा है. यही वजह है कि अब बकरी पालन में शहर के लोग भी सामने आ रहे हैं. शहरी युवा अब इसे रोजगार मानकर कर रहे हैं. प्रोडक्ट की डिमांड के हिसाब से बकरे-बकरी का पालन कर रहे हैं. केन्द्र और राज्य सरकारें भी रोजगार के तौर पर बकरी पालन को बढ़ावा दे रही हैं. और अच्छी बात ये है कि बकरी पालन में आने वाले युवा रजिस्टर्ड नस्ल के बकरे-बकरियों का कारोबार कर रहे हैं.
यही वजह है कि अभी तक बकरे के मीट एक्सपोर्ट में रजिस्टर्ड नस्ल ब्लैक बंगाल, बीटल और बरबरी नस्ल के बकरों की डिमांड होती थी. लेकिन अब सो नए-नए रजिस्टर्ड हुए सोजत और गुजरी नस्ल के बकरों की भी खूब डिमांड आ रही है. दोनों ही नस्ल को मीट के लिए पसंद किया जा रहा है. 25 से 30 किलो वजन तक के बकरों की डिमांड हो रही है.
गोट एक्सपर्ट की मानें तो गुजरी नस्ल खासतौर पर राजस्थान के अलवर में पाई जाती है. इस नस्ल के बकरे का औसत वजन 69 और बकरी का 58 किलो तक होता है. लेकिन इस नस्ल के बकरे की स्पेशल तरीके से खिलाई कर उसे वजनी बनाया जा सकता है. जानकारों की मानें तो बकरा 150 किलो के वजन को भी पार कर जाता है. इस नस्ल की बकरी रोजाना औसत 1.60 किलोग्राम तक दूध देती है. यह सफेद और भूरे रंग की होती है. इसके पेट, मुंह और पैर पर सफेद धब्बे होते हैं.
सोजत नस्ल की बकरी नागौर, पाली, जैसलमेर और जोधपुर में पाई जाती है. यह जमनापरी की तरह से सफेद रंग की बड़े आकार वाली नस्ल की बकरी है. इसे खासतौर पर मीट के लिए पाला जाता है. इस नस्ल का बकरा औसत 60 किलो वजन तक का होता है. बकरी दिनभर में एक लीटर तक दूध देती है. सोजत की नार्थ इंडिया समेत महाराष्ट्रा में भी खासी डिमांड रहती है.
कोटा, बूंदी, बांरा और सवाई माधोपुर में करोली नस्ल की बकरियों खूब पाली जाती हैं. औसत 1.5 लीटर तक दूध रोजाना देती हैं. लेकिन स्थानीय लोगों की मानें तो राजस्थान और यूपी के लोकल बाजारों में इसके मीट की खासी मांग है. इसका पूरा शरीर काले रंग का होता है. सिर्फ चारों पैर के नीचे का हिस्सा भूरे रंग का होता है. इसकी एक खास बात यह भी है कि सिर्फ मैदान और जंगलों में चरने पर ही यह वजन के मामले में अच्छा रिजल्ट देती है.
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