Sheep Farming: भेड़ों को इन 2 बीमारियों से रखा दूर तो खूब बढ़ेगा ऊन-मीट का उत्पादन, पढ़ें डिटेल

Sheep Farming: भेड़ों को इन 2 बीमारियों से रखा दूर तो खूब बढ़ेगा ऊन-मीट का उत्पादन, पढ़ें डिटेल

एनिमल एक्सपनर्ट का कहना है कि बकरी की तरह से भेड़ पालन में भी अगर आप मेमनों की मृत्यु दर को कंट्रोल कर लेते हैं तो फिर मुनाफा बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता है. और ये तभी मुमकिन है जब भेड़ पालक साइंटीफिक तरीका अपनाकर वक्त से वैक्सीनेशन कराते हुए भेड़ पालन करें. 

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Sheep Farming: भेड़ों को इन 2 बीमारियों से रखा दूर तो खूब बढ़ेगा ऊन-मीट का उत्पादन, पढ़ें डिटेलखुले मैदान में चरतीं भेड़. फोटो क्रेडिट-किसान तक

एनिमल एक्सपर्ट का कहना है कि पशुपालन छोटे पशुओं का किया जाए या बड़े पशुओं का उस पर खुराक और बीमारियों पर सबसे ज्यादा खर्च होता है. बेहतर उत्पादन के लिए खुराक में तो कटौती नहीं कर सकते, लेकिन कुछ बातों का ख्याल रखकर पशुओं में होने वाली बीमारियों की रोकथाम जरूर की जा सकती है. इसी तरह भेड़ पालन राजस्थान में हो या फिर जम्मू-कश्मीर में, भेड़ों को बीमारियां जल्दी अपनी चपेट में लेती है. आमतौर पर भेड़-बकरी की बीमारियां एक जैसी हैं, लेकिन दोनों के पालन में अंतर है. बकरियों के मुकाबले भेड़ों को खुले में ज्यादा चराया जाता है. 

भेड़ पालन खासतौर पर ऊन और मीट के लिए किया जाता है. जबकि भेड़ का दूध उत्पादन और डिमांड दोनों ही कम हैं. हालांकि ऊन की डिमांड भी अब कुछ कम हो गई है, लेकिन मीट की डिमांड तेजी से बढ़ रही है. यही वजह है कि अगर भेड़ों से मोटा मुनाफा कमाना है तो उन्हें बीमारियों से दूर रखना होगा.  

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 भेड़ों को बहुत परेशान करती है कॉन्टेजियस एकतामा

एरिया के हिसाब से भेड़ों की कॉन्टेजियस एकतामा बीमारी को पशुपालक अलग-अलग नाम से जानते हैं. जैसे पहाड़ी इलाकों गददी भेड़ पालने वाले इस बीमारी को मौढ़े कहते हैं. यह बीमारी एक खास तरह के विषाणु से होती है. इसके चलते भेड़ के मुंह-नाक और होठों के बाहरी तरफ फोड़े हो जाते हैं. वक्त से इलाज ना मिलने पर ये काफी बढ़ जाते हैं, जिसके चलते भेड़ का मुंह फूल जाता है. भेड़ को घास खाने में तकलीफ का सामना करना पड़ता है. साथ ही साथ बीमार भेड़ को हल्का बुखार भी आ जाता है.

कॉन्टेजियस एकतामा से भेड़ों को ऐसे बचाएं

  • बीमार भेड़ को अलग कर उनका इलाज कराना चाहिए. 
  • हर रोज फोड़ों को लाल दवाई के घोल से धोएं. 
  • भेड़ के फोड़ों पर एन्टीसेप्टिक मलहम लगाना चाहिए. 
  • डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक इन्जेक्शन लगवाएं. 

भेड़ों की जान तक जाती है एन्थ्रेक्स से

एन्थ्रेक्स बीमारी को भेड़ पालक रक्तांजली बीमारी के नाम से जानते हैं. यह रोग जीवाणु द्वारा होता है. इस बीमारी के होने पर भेड़ को बहुत ते बुखार आता है. सही वक्त पर इलाज ना मिलने पर भेड़ की मौत तक हो जाती है. जब भेड़ की मौत होने वाली होती है तो उसके नाक-कान, मुंह और गुदा से खून आने लगता है.

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भेड़ों को एन्थ्रेक्स से ऐसे बचाएं 

  1. एन्थ्रेक्स से मरने वाली भेड़ों की खाल नहीं निकानी चाहिए. 
  2. मरी हुई भेड़ को गहरे गड्ढे में दबा देना चाहिए. 
  3. जहां भेड़ मरे उस शेड को खत्म कर नया शेड बनाएं. 
  4. भेड़ों की चरागाह को भी बदल देना चाहिए. 
  5. डॉक्टर की सलाह पर एंटीबायोटिक इन्जेक्शन लगवाएं. 
  6. सरकारी केन्द्र पर चार्ट के अनुसार भेड़ का वैक्सीनेशन कराएं. 
     

 

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