
सूरत, नवसारी, वलसाड़ और भरुच साउथ गुजरात के वो इलाके हैं जहां बड़े पैमाने पर झींगा पालन किया जाता है. इसे झींगा फार्मिंग बेल्ट भी कहा जाता है. मुम्बई के रास्ते यहां होने वाला ज्यादातर झींगा दूसरे देशों को एक्सपोर्ट किया जाता है. लेकिन अफसोस की बात ये है कि अब यहां के ज्यादातर झींगा तालाब समतल हो चुके हैं. तालाब की जगह पर समतल जमीन और गंदगी रह गई है. ये वो गंदगी है जो बाढ़ के पानी के साथ बहकर आई है. अचानक आई बाढ़ ने देखते ही देखते करीब 16 सौ तालाब को समतल जमीन में बदल दिया.
झींगा एक्सपर्ट की मानें तो झींगा पालन को ये एक बड़ा झटका लगा है. ऐसी आशंका जताई जा रही है कि बर्बाद होने वाले झींगा तालाबों में से करीब आधे तालाब का दोबारा से शुरू हो पाना मुश्किल है. बाढ़ की वजह से करीब 800 करोड़ रुपये का नुकसान बताया जा रहा है. क्योंकि तालाब में झींगा तैयार हो चुका था. बस कुछ ही दिन बाद निकालकर बाजार की तैयारी करनी थी.
झींगा किसान और एक्सपर्ट डॉ. मनोज शर्मा ने किसान तक को बताया कि बाढ़ के चलते झींगा तालाबों की जो हालत हो गई है उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि तालाबों को झींगा पालन के लिए दोबारा से तैयार करने में तीन से चार महीने लग जाएंगे. क्योंकि बाढ़ के पानी संग आई गंदगी की वजह से नालियां जाम हो गई हैं. तालाब के बांध टूट गए. वहां रखे पम्प में गंदगी भर गई है. तालाब में इस्तेमाल होने वाली ज्यादातर मशीनरी खराब हो गई है या मिट्टी में दब गई है. स्टोर में रखा फीड पानी संग बह गया है या फिर पानी से भीगकर खराब हो गया है.
झींगा पालन से जुड़े किसान बाढ़ के चलते अपना सब कुछ खो चुके हैं. दोबारा से झींगा पालन करने के लिए उनके पास कुछ नहीं बचा है. यही वजह है कि किसान मुआवजे के साथ ही अपने लिए पुनर्वास पैकेज की मांग केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारों से कर रहे हैं.
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