विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा मालवी ऊंट, घटती आबादी को बचाने के लिए शुरू हुआ विशेष अभियान

विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा मालवी ऊंट, घटती आबादी को बचाने के लिए शुरू हुआ विशेष अभियान

भारत की दुर्लभ मालवी ऊंट नस्ल अब विलुप्त होने की कगार पर है. घटती आबादी को देखते हुए नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल (NRCC) ने विशेष प्रजनन और संरक्षण कार्यक्रम शुरू किया है, ताकि इस अनमोल नस्ल को बचाया जा सके.

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विलुप्त होने की कगार पर पहुंचा मालवी ऊंट, घटती आबादी को बचाने के लिए शुरू हुआ विशेष अभियानमालवी ऊंट

देश की दुर्लभ पशु नस्लों में शामिल मालवी यानी सफेद ऊंट अब विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गया है. भारत में ऊंटों की नौ मान्यता प्राप्त नस्लें हैं, लेकिन इनमें से मालवी नस्ल की संख्या तेजी से घटकर सिर्फ 102 रह गई है. यही वजह है कि नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल (NRCC) ने इस अनोखी नस्ल को बचाने के लिए विशेष संरक्षण और प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया है. अधिकारियों के अनुसार, 2019 की पशुगणना में मालवी ऊंटों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज की गई थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसी ऊंट नस्ल में प्रजनन करने वाली मादा ऊंटों की संख्या 300 से कम रह जाती है, तो उसे विलुप्त माना जाता है. मालवी नस्ल के अलावा मेवाड़ी और मेवाती ऊंट भी इसी श्रेणी में आते हैं.

NRCC ने शुरू किया प्रजनन कार्यक्रम

इस गंभीर स्थिति को देखते हुए NRCC ने मालवी ऊंटों की संख्या बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक तरीके से प्रजनन की योजना बनाई है. संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. वेद प्रकाश ने बताया कि केंद्र ने अब तक 12 मालवी ऊंट, जिनमें 3 नर और 9 मादा शामिल हैं, अपने संरक्षण कार्यक्रम में शामिल किए हैं. इन ऊंटों के माध्यम से शुद्ध प्रजनन कर उनकी आबादी बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा. डॉ. वेद प्रकाश ने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि मालवी ऊंट की आनुवंशिक शुद्धता और उसकी खास पहचान को भी सुरक्षित रखना है. वैज्ञानिक आधुनिक तकनीकों की मदद से इस नस्ल की विशेषताओं को संरक्षित करने पर काम कर रहे हैं.

सफेद रंग और दूध उत्पादन है खासियत

मालवी ऊंट अपनी सफेद रंगत के कारण बेहद खास माना जाता है. यह भारत की सभी ऊंट नस्लों में सबसे छोटा होता है. इसकी एक और बड़ी विशेषता इसका दूध उत्पादन है. एक मादा मालवी ऊंट एक दुग्ध ब्यान में लगभग 4 से 5 किलोग्राम दूध दे सकती है, जिससे यह पशुपालकों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है.

इन राज्यों में पाई जाती है ये दुर्लभ नस्ल

यह ऊंट मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र, जैसे मंदसौर, नीमच, रतलाम और ग्वालियर. इसके अलावा राजस्थान के कोटा, बूंदी, झालावाड़ और बारां जिलों में पाया जाता है. पहले इसका उपयोग परिवहन और सामान ढोने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता था, लेकिन बदलती जीवनशैली, आधुनिक वाहनों के बढ़ते उपयोग और घटती आर्थिक उपयोगिता के कारण इसकी संख्या लगातार कम होती जा रही हैं.

पशुपालकों को किया जाएगा जागरूक

NRCC इस संरक्षण कार्यक्रम को नेशनल ब्यूरो ऑफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्सेज (NBAGR), करनाल के नेटवर्क प्रोजेक्ट के तहत चला रहा है. इसके साथ ही वैज्ञानिक पशुपालकों के बीच जागरूकता फैलाने और इस नस्ल की उपयोगिता के बारे में जानकारी देने का भी काम कर रहे हैं.  विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते वैज्ञानिक प्रयास, बेहतर प्रजनन तकनीक और पशुपालकों का सहयोग मिलता रहा, तो मालवी ऊंट जैसी भारत की यह अनमोल और दुर्लभ विरासत विलुप्त होने से बचाई जा सकती है. (PTI)

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