
फरवरी 2026 में देश के मौसम का मिजाज किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण रहने वाला है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के लंबी अवधि के पूर्वानुमान के मुताबिक, देश के ज्यादातर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रहने की आशंका है, जबकि न्यूनतम और अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने की संभावना जताई गई है. यह आउटलुक रबी फसलों, बागवानी और पशुपालन पर सीधा असर डाल सकता है. IMD के अनुसार, उत्तर पश्चिम भारत में फरवरी के दौरान औसत बारिश सामान्य से काफी कम रहने की संभावना है.
विभाग के अनुसार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और लद्दाख जैसे इलाकों में फरवरी की बारिश दीर्घकालिक औसत के 78 प्रतिशत से भी कम रह सकती है. पूरे देश की बात करें तो कुल मासिक वर्षा के 81 प्रतिशत से नीचे रहने की आशंका जताई गई है.
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, देश के अधिकतर हिस्सों में नीचे-से-सामान्य बारिश की स्थिति बन सकती है. हालांकि, उत्तर पश्चिम और पूर्व मध्य भारत के कुछ सीमित क्षेत्रों में तथा पूर्वोत्तर भारत के अत्यंत दक्षिणी हिस्सों में सामान्य से सामान्य से अधिक बारिश के संकेत मिल रहे हैं. जहां फरवरी में वैसे भी बारिश बहुत कम होती है, वहां मॉडल का संकेत कमजोर माना गया है.
तापमान की बात करें तो फरवरी 2026 में रात का तापमान यानी न्यूनतम तापमान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से ऊपर रहने की संभावना है. दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में ही न्यूनतम तापमान सामान्य रह सकता है. दिन का तापमान यानी अधिकतम तापमान भी ज्यादातर इलाकों में सामान्य से ऊपर रहने का अनुमान है, जबकि मध्य भारत और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में यह सामान्य के आसपास बना रह सकता है.
ठंड के लिहाज से यह राहत भरी खबर हो सकती है. पूर्वानुमान के अनुसार, फरवरी में देश के अधिकतर हिस्सों में शीतलहर के दिन सामान्य सीमा में रहेंगे. उत्तर पश्चिम और उससे सटे मध्य भारत के कुछ हिस्सों में शीतलहर के दिन सामान्य से कम रहने की संभावना है यानी कड़ाके की ठंड के लंबे दौर की आशंका कम है.
समुद्री हालात भी इस मौसम पैटर्न में अहम भूमिका निभा रहे हैं. फिलहाल प्रशांत महासागर में ला नीना की स्थिति बनी हुई है, लेकिन संकेत हैं कि फरवरी से मार्च-अप्रैल 2026 के दौरान यह धीरे-धीरे ENSO न्यूट्रल की ओर बढ़ सकती है. वहीं, हिंद महासागर में इंडियन ओशन डाइपोल की स्थिति तटस्थ बनी हुई है और आने वाले महीनों में इसके ऐसे ही बने रहने की संभावना है.
किसानों के लिहाज से समझा जाए तो अधिक तापमान और कम बारिश के कारण गेहूं और जौ जैसी रबी फसलों में तेजी से बढ़वार और समय से पहले पकने का खतरा बढ़ सकता है. इससे दाने भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और उपज घटने की आशंका रहती है. वहीं, सरसों, चना, मसूर और मटर जैसी फसलों में फूल और फल बनने की अवस्था पर गर्मी का असर पड़ सकता है, जिससे दाना छोटा और पैदावार कम हो सकती है.