
उत्तर प्रदेश सरकार और India Today Group के साझा प्रयास से शुरू हुआ “किसान कारवां” अब किसानों के बीच एक अलग पहचान बन चुका है . 29 दिसंबर 2025 को अमरोहा से शुरू हुई यह यात्रा अब पूर्वांचल तक पहुंच चुकी है. प्रदेश के 75 जनपदों को जोड़ने वाले इस अभियान ने अब तक 42 जिलों के 215 गांवों तक पहुंचकर 4,442 किलोमीटर का सफर तय किया है. इस दौरान 50 हजार से अधिक किसान सीधे इस कारवां से जुड़े और उन्हें खेती, पशुपालन, जैविक कृषि, मशरूम उत्पादन, सरकारी योजनाओं और आधुनिक तकनीकों की जानकारी मिली.
पूर्वांचल के 10 जिलों में किसान कारवां ने करीब 880 किलोमीटर की यात्रा की, जहां 50 गांवों के 10 हजार से ज्यादा किसानों ने इसमें भाग लिया. यह कारवां केवल प्रचार कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि किसानों की समस्याओं का समाधान और उनकी आय बढ़ाने का माध्यम बनता जा रहा है.
पूर्वांचल के किसान लंबे समय से आवारा पशुओं की समस्या से परेशान थे. फसलों को भारी नुकसान होने के कारण किसान परेशान रहते थे. ऐसे समय में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सरसों की खेती की सलाह दी.वैज्ञानिकों ने बताया कि सरसों की फसल को पशु कम नुकसान पहुंचाते हैं और इससे किसानों को अच्छा लाभ भी मिलता है.
किसानों ने इस सुझाव को अपनाया और अब पूर्वांचल के कई जिलों में सरसों के उत्पादन में 50 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की जा रही है. सरकार की तिलहन उत्पादन बढ़ाने की योजना का असर अब साफ दिखाई देने लगा है.
अयोध्या कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. पंकज कुमार सिंह ने बताया कि सरसों उत्पादन बढ़ाने में आरएस-725 किस्म का बड़ा योगदान रहा है. यह किस्म किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है.
किसान कारवां किसानों के लिए ऐसा मंच बन गया है जहां उन्हें नई और उन्नत बीज किस्मों की जानकारी मिल रही है. अयोध्या कृषि विज्ञान केंद्र के हेड एवं अध्यक्ष डॉ. वी.पी. शाही ने किसानों को सरसों, गेहूं और बिना छिलके वाली जौ की नई किस्मों के बारे में जानकारी दी.
उन्होंने विशेष रूप से “गीतांजलि” नाम की बिना छिलके वाली जौ की वैरायटी के बारे में बताया. इस किस्म को लेकर किसानों में काफी उत्साह देखने को मिला. कई किसानों ने वैज्ञानिकों से बीज उपलब्ध कराने की मांग भी की.
किसानों का कहना है कि यदि उन्हें अच्छी किस्म के बीज समय पर मिल जाएं तो उनकी आमदनी कई गुना बढ़ सकती है.
किसान कारवां के दौरान पूर्वांचल में जैविक खेती की बढ़ती तस्वीर भी सामने आई. गंगा किनारे के जिलों में बड़ी संख्या में किसान अब रासायनिक खेती छोड़ जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं.
प्रतापगढ़ के सहायक विकास अधिकारी कृषि पंकज पांडे ने बताया कि जैविक खेती में गोमूत्र की महत्वपूर्ण भूमिका है. उन्होंने किसानों को बताया कि बीजामृत और जीवामृत जैसी तकनीकों से कम लागत में बेहतर खेती की जा सकती है.
उन्होंने किसानों को भरोसा दिलाया कि जो किसान जैविक खेती अपनाना चाहते हैं, उन्हें हर संभव सहायता दी जाएगी. यहां तक कि अधिकारी किसानों के घर जाकर भी उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए तैयार हैं.
किसान कारवां के मंच से उन्होंने अपना मोबाइल नंबर भी साझा किया ताकि किसान कभी भी सलाह ले सकें.
पूर्वांचल के मऊ और देवरिया जैसे जिलों में बड़ी संख्या में महिलाएं अब मशरूम की खेती से आत्मनिर्भर बन रही हैं. खास बात यह है कि मशरूम उत्पादन के लिए बड़े खेत की जरूरत नहीं होती. इसे घर के एक कमरे में भी आसानी से किया जा सकता है.
मऊ कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. सुमित कुमार गुप्ता ने बताया कि मशरूम की खेती बेहद आसान और लाभकारी है. एक बैग से आठ बार तक उत्पादन लिया जा सकता है और लगभग 5 किलो मशरूम प्राप्त होता है. उन्होंने बताया कि यदि कोई किसान 8 से 10 हजार रुपये की लागत लगाता है तो वह 35 हजार रुपये तक की कमाई कर सकता है. यही कारण है कि महिलाएं तेजी से इस व्यवसाय से जुड़ रही हैं.
किसान कारवां के दौरान किसानों को पोषण वाटिका बनाने के लिए भी प्रेरित किया गया. वैज्ञानिकों ने बताया कि हर किसान के घर के आसपास थोड़ी जमीन जरूर होती है, जहां पोषण वाटिका बनाकर पूरे परिवार को सालभर ताजी और पौष्टिक सब्जियां उपलब्ध कराई जा सकती हैं.
भदोही कृषि विज्ञान केंद्र की गृह विज्ञान वैज्ञानिक डॉ. रेखा सिंह ने बताया कि पोषण वाटिका में रंग-बिरंगी सब्जियां उगानी चाहिए.इससे परिवार को पर्याप्त विटामिन और मिनरल मिलते हैं और बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर रहता है.
किसान कारवां के दौरान कई किसानों ने अपनी सफलता की कहानियां भी साझा कीं. सुल्तानपुर के किसान शालिग्राम पाल ने बताया कि अब किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ आसानी से मिल रहा है. ब्लॉक स्तर पर खाद, बीज और दवाइयां उपलब्ध हैं.
अंबेडकर नगर के किसान विश्वनाथ सिंह ने बताया कि उन्हें सरकार की मछली पालन योजना का लाभ मिला है और अब वे बागवानी भी कर रहे हैं.
किसान शशि कुमार ने बताया कि उन्हें मुख्यमंत्री युवा योजना के तहत 5 लाख रुपये तक का ऋण मिला, जिससे वे अपना काम शुरू कर सके.
किसान कारवां अब केवल एक सरकारी अभियान नहीं बल्कि किसानों के जीवन में बदलाव की कहानी बन चुका है. यह कारवां किसानों को नई तकनीक, उन्नत खेती, सरकारी योजनाओं और आत्मनिर्भरता का संदेश दे रहा है.मऊ के किसान आलोक सिंह ने कहा कि किसान कारवां से उन्हें एक ही मंच पर खेती, पशुपालन और सरकारी योजनाओं की जानकारी मिली. उन्होंने मांग की कि इस तरह के कार्यक्रम ब्लॉक स्तर पर भी नियमित रूप से आयोजित किए जाएं.