रामलीला मैदान रैली: सरकार और विपक्ष के धड़े आमने-सामने, MSP कमेटी सदस्य ने उठाए सवाल

रामलीला मैदान रैली: सरकार और विपक्ष के धड़े आमने-सामने, MSP कमेटी सदस्य ने उठाए सवाल

किसान नेता बिनोद आनंद ने कहा कि देश के किसानों और युवाओं की असली जरूरतें कुछ और हैं, जिन पर राजनीति करने के बजाय मिलकर काम करना चाहिए. जैसे किसानों को उनकी फसलों की सही कीमत यानी एमएसपी मिले, खेती में सुधार हो और गांवों के युवाओं व महिलाओं को आसानी से बैंक से लोन मिले ताकि वे अपना काम शुरू कर सकें.

एमएसपी कमेटी के सदस्य बिनोद आनंदएमएसपी कमेटी के सदस्य बिनोद आनंद
क‍िसान तक
  • नई दिल्ली,
  • Nov 01, 2026,
  • Updated Nov 01, 2026, 9:14 AM IST

दिल्ली के रामलीला मैदान में आज 1 नवंबर को हो रही विपक्ष की महारैली को लेकर देश का राजनीतिक माहौल गरमा गया है, और इस मुद्दे पर सरकार समर्थित पक्ष और विपक्ष के दो अलग-अलग धड़े आमने-सामने आ गए हैं. एक तरफ जहां विपक्षी दल चुनाव प्रक्रिया में सुधार और लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर इस बड़ी रैली के जरिए अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार की नीतियों और व्यवस्था से जुड़े पक्षों की ओर से इस आंदोलन के समय और तरीके पर सवाल उठाए जा रहे हैं. इसी कड़ी में प्रधानमंत्री द्वारा बनाई गई एमएसपी कमेटी के सदस्य और हजारों ग्रामीण एनजीओ के संगठन (CNRI) के मुखिया बिनोद आनंद ने विपक्षी नेताओं को चिट्ठी लिखकर इस रैली का विरोध किया है. उनका कहना है कि त्योहारों के इस सीजन में सड़कों पर आंदोलन करने से आम लोगों और किसानों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है.

बिनोद आनंद और ग्रामीण संगठनों का कहना है कि यह समय धनतेरस, दिवाली और भाई दूज जैसे बड़े त्योहारों का है. इस समय किसान अपनी फसलें बेचकर त्योहार का खर्च निकालते हैं और छोटे दुकानदार सालभर की सबसे बड़ी कमाई की उम्मीद लगाए बैठे होते हैं. ऐसे में अगर दिल्ली और उसके आस-पास बड़े आंदोलन या धरने-प्रदर्शन होते हैं, तो रास्ते बंद होने का खतरा रहता है. इससे गांवों से मंडियों तक सब्जियां, अनाज और दूध पहुंचाने में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसलिए इन संगठनों की मांग है कि विरोध प्रदर्शन सिर्फ मैदानों तक सीमित रहे और सड़कों पर आम जनता को परेशानी न हो.

कमाई और पढ़ाई के असली मुद्दे

प्रधानमंत्री की एमएसपी कमेटी के सदस्य होने के नाते बिनोद आनंद ने कहा कि देश के किसानों और युवाओं की असली जरूरतें कुछ और हैं, जिन पर राजनीति करने के बजाय मिलकर काम करना चाहिए. जैसे किसानों को उनकी फसलों की सही कीमत यानी एमएसपी मिले, खेती में सुधार हो और गांवों के युवाओं व महिलाओं को आसानी से बैंक से लोन मिले ताकि वे अपना काम शुरू कर सकें. इसके अलावा परीक्षाओं में होने वाली धांधली और पेपर लीक तुरंत बंद हो, ताकि ग्रामीण युवाओं का भविष्य सुरक्षित रहे.

सड़क पर हंगामा या कोर्ट का रास्ता?

चिट्ठी में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से अपील की गई है कि अगर उन्हें चुनाव आयोग या वोटर लिस्ट से कोई भी शिकायत है, तो उन्हें सड़कों पर प्रदर्शन करने के बजाय देश के कानून और कोर्ट का रास्ता अपनाना चाहिए. उनका तर्क है कि संवैधानिक संस्थाओं पर बहुत ज्यादा दबाव बनाने से वे कमजोर होती हैं, जिससे देश का ही नुकसान होता है.

विदेशी नैरेटिव से सावधान

बिनोद आनंद ने देश के ग्रामीण युवाओं को एक जरूरी सलाह दी है. उन्होंने कहा कि आज पीएम-किसान सम्मान निधि, ड्रोन दीदी और लखपति दीदी जैसी योजनाओं से गांवों में एक बड़ा और सकारात्मक बदलाव आ रहा है. कुछ विदेशी ताकतें इस तरक्की को रोकना चाहती हैं और देश का माहौल खराब करना चाहती हैं. इसलिए युवाओं को सोशल मीडिया के बहकावे में आकर सड़कों पर प्रदर्शन करने के बजाय बातचीत के जरिए देश को आगे बढ़ाने में अपना योगदान देना चाहिए. कुल मिलाकर, जहां विपक्ष इस रैली को जनता के अधिकारों की लड़ाई बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ से यह साफ संदेश दिया जा रहा है कि देश को आगे बढ़ाने के लिए सड़कों पर आंदोलन की नहीं, बल्कि संवाद की जरूरत है.

MORE NEWS

Read more!