
छह साल पहले तक बांस का इस्तेमाल यदा कदा ही नजर आता था. असम, मेघालय और मिजोरम से आने वाली तस्वीरों को देखकर जरूर महसूस होता था कि बांस का इस्तेमाल बहुत सारे आइटम बनाने में होता है. लेकिन बीते छह साल में बड़ा बदलाव आया है. अब अच्छा बदलाव ये आया है कि होटल-रेस्टोरेंट, घर और यहां तक की छोटी से लेकर बड़ी इंडस्ट्री में हर तरफ बांस ही बांस नजर आने लगा है. अब तो अगर बाजार में आप जिस चम्मच से आइसक्रीम खा रहे हैं वो भी बांस के बने आ रहे हैं.
इंटीरियर के कारोबार में भी बांस अपनी जगह बना चुका है. बाजार में जगह-जगह बांस के बने शोपीस आइटम बिकते हुए दिखाई देने लगे हैं. सड़क किनारे बांस का बना फर्नीचर दिखाई दे जाता है. इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (आईएचबीटी), पालमपुर, हिमाचल प्रदेश के साइंटिस्ट का कहना है कि देश के सभी राज्यों में बांस की अलग-अलग किस्म पैदा होती है. इस वक्त देश में बांस की करीब 100 से ज्यादा किस्म हैं. खास बात ये है कि सभी की डिमांड कमर्शियल मार्केट में हो रही है.
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आईएचबीटी के साइंटिस्ट डॉ. रोहित मिश्रा ने किसान तक से बातचीत में बताया कि कुछ वक्त पहले की बात करें तो चाउमीन, आइसक्रीम, और जूस-शेक को मिलाने के लिए प्लास्टिक के चम्मच-कांटे और स्टिक का इस्तेमाल करते थे. लेकिन अच्छीो बात ये है कि प्रदूषण फैलाने वाले प्लास्टिक के वो आइटम बाजार से काफी हद तक बाहर हो गए हैं. उनकी जगह अब बांस ने ले ली है. बांस के बने चम्मचे-कांटे और स्टिक आ रहे हैं.
इतना ही नहीं जिस अगरबत्ती के कारोबार में लकड़ी की बनी स्टिक का इस्तेमाल किया जाता था, वहां भी अब बांस की स्टिक अगरबत्ती में लगाई जा रही हैं. मोसो बांस अगरबत्ती के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. इसकी एक बड़ी खासियत ये भी है कि यह जलने पर कम कार्बन मोनो ऑक्साइड छोड़ता है.
डॉ. रोहित मिश्रा का कहना है कि आजकल बांस के पौधे घर में भी खूब सजाए जा रहे हैं. इन्हें ऑर्नामेंटल बैम्बू कहा जाता है. इसकी छह वैराइटी आती हैं. फूलों के मुकाबले इनकी केयर भी कम करनी होती है. पानी भी कम ही इस्तेमाल होता है. जैसे एक बांस की बेल आती है. इसे डाइनाक्लोबा के नाम से जाना जाता है. एक घास जैसा बांस भी आता है. इसे सासा ओरीकोमा कहते हैं. डेंट्रोकैलिमा जाइगेंटियस बांस की बात करें तो बांस की वैराइटी में ये सबसे मोटा और ऊंचा बांस है. इसकी लम्बाई 80 फीट तक होती है.
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रोहित मिश्रा ने बताया कि बांस का अचार बिकना और खाना तो आम बात है. लेकिन बांस की सब्जी भी खाई जा रही है और बांस का मुरब्बा भी बनाया जा रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी एक खास बांस की सब्जी बनाई जाती है या फिर उसका अचार डाला जाता है. असल में बहुत सारे बांस है जिनकी सब्जी भी खाई जाती है और उसका मुरब्बा भी बनाया जाता है. होता ये है कि जब बांस हरे रंग का होता है तो उसके ऊपर सफेद रंग की नई कोपल आती हैं. बस इसी सफेद रंग की कोपल को खाया और पकाया जाता है. इसमे मिनरल्स काफी मात्रा में पाए जाते हैं.