
देश में हर साल खरीफ सीजन के दौरान किसानों को खाद, खासकर यूरिया और डीएपी के लिए लंबी कतारों का सामना करना पड़ता है. लेकिन, इस बार हालात और चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होने के कारण खाद और उसके कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हुई है, जिससे आने वाले खरीफ सीजन में यूरिया संकट गहराने की आशंका है. इफको के एक सूत्र के मुताबिक, LNG सप्लाई में करीब 30 फीसदी की कमी आई है.
इसी कारण इफको के आंवला और कलोल स्थित फर्टिलाइजर प्लांट अस्थायी रूप से शटडाउन करने पड़े हैं. आमतौर पर अप्रैल में लीन पीरियड के चलते कुछ दिनों का शटडाउन सामान्य होता है, लेकिन इस बार अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने स्थिति को गंभीर बना दिया है. उत्पादन में यह रुकावट सीधे तौर पर यूरिया की उपलब्धता पर असर डाल सकती है.
हाल के वर्षों के आंकड़े देखें तो खरीफ सीजन के दौरान यूरिया की खपत लगभग 170 से 180 लाख टन के बीच रहती है. उदाहरण के तौर पर 2023-24 खरीफ सीजन में यूरिया की खपत करीब 18.2 यानी 182 लाख टन मिलियन टन रही. ऐसे में अगर सप्लाई प्रभावित होती है तो मांग और उपलब्धता के बीच अंतर बढ़ सकता है, जिससे किसानों को समय पर खाद मिलने में दिक्कत आ सकती है. वहीं, यह भी एक नोट करने वाली बात है कि 2 साल से खरीफ सीजन के रकबे में बढ़ोतरी भी दर्ज की जा रही है यानी इसके साथ खाद की खपत में वृद्धि होना भी तय है.
वहीं, सरकार ने फिलहाल देश में पर्याप्त उर्वरक भंडार होने का दावा किया है. केंद्र सरकार की ओर से जारी हाल ही में एक आधिकारिक बयान के मुताबिक, देश में 23 मार्च 2026 तक 53.08 लाख मीट्रिक टन यूरिया, 21.80 लाख मीट्रिक टन डीएपी, 7.98 लाख मीट्रिक टन एमओपी और 48.38 लाख मीट्रिक टन एनपीके का भंडार उपलब्ध है . हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर आयात और उत्पादन दोनों पर दबाव बना रहता है तो यह भंडार खरीफ की चरम मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हाेगा.
भारत अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उर्वरकों और उनके कच्चे माल के आयात पर काफी हद तक निर्भर है. पश्चिम एशिया में तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण यह सप्लाई चेन प्रभावित हो रही है. इससे न सिर्फ तैयार खाद, बल्कि उसके उत्पादन के लिए जरूरी कच्चे माल की उपलब्धता भी प्रभावित हो रही है, जिसका असर घरेलू उत्पादन पर दिखने लगा है.
अगर यही स्थिति बनी रहती है तो खरीफ सीजन के दौरान किसानों को खाद के लिए ज्यादा इंतजार और ऊंची प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है. समय पर यूरिया नहीं मिलने से फसलों की बुवाई और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में सरकार और एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि सप्लाई और उत्पादन को संतुलित रखा जाए और किसानों तक खाद की उपलब्धता समय पर सुनिश्चित की जाए.