
केंद्र सरकार ने खेती के ताजा आंकड़ों के साथ अपनी सफलता के बारे जानकारी दी है, जिसमें साफ जाहिर है कि सरकार का मानना है कि उनकी कोशिशों और सही मंसूबों की बदौलत आज देश में अनाज के मुकाबले फल-सब्जियों की पैदावार कहीं ज्यादा हो गई है. साल 2024-25 के आंकड़े गवाह हैं कि भारत ने 35.77 करोड़ लाख टन अनाज पैदा करके एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है. दिलचस्प बात यह है कि अब देश के किसान सिर्फ पारंपरिक फसलों तक सीमित नहीं हैं, अब बागवानी का उत्पादन भी 36.20 करोड टन तक पहुंच गया है, जो अनाज से भी आगे निकल गया है. यह इस बात का साफ इशारा है कि भारतीय किसान अब 'हाई-वैल्यू' फसलों की तरफ रुख कर रहे हैं. फल, सब्जियां और मसालों की बढ़ती पैदावार ने गांवों की अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है.
खेती-बाड़ी का हमारे देश की जीडीपी में लगभग 20 फीसदी का योगदान है, भारत आज दुनिया के लिए सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि एक 'ग्लोबल फूड बास्केट' बन चुका है, सरकार का कहना है कि अनाज आज दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच रहा है. कृषि निर्यात की रफ्तार का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह 2020 के 34.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 51.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. इसमें सबसे खास बात यह है कि अब हम सिर्फ कच्चा माल नहीं बेच रहे, बल्कि 'प्रोसेस्ड फूड' तैयार उत्पादों का हिस्सा भी 20 फीसदी से ज्यादा हो गया है.
सरकार का कहना है किसी भी क्षेत्र की तरक्की के लिए निवेश की जरूरत होती है, और सरकार ने कृषि बजट में भारी इजाफा करके अपनी नीयत साफ कर दी है. साल 2013-14 में जहां कृषि विभाग का बजट महज 21,933 करोड़ रुपये था, वहीं 2026-27 के लिए इसे बढ़ाकर 1.30 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है. यह लगभग छह गुना की बढ़ोतरी की गई है. इस भारी-भरकम रकम का इस्तेमाल नई तकनीकों, सिंचाई परियोजनाओं और किसानों को सीधे मदद पहुंचाने में किया जा रहा है. बजट में खास तौर पर तटीय इलाकों के लिए नारियल और काजू, उत्तर-पूर्व के लिए अगर के पेड़ और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अखरोट और बादाम जैसी कीमती फसलों को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है.
सरकार का कहना है कि खेती हमेशा से जोखिम भरा काम रहा है, ऐसे में 'पीएम-किसान' सम्मान निधि योजना करोड़ों परिवारों के लिए एक बड़ी राहत बनकर उभरी है. अब तक 22 किस्तों में किसानों के बैंक खातों में सीधे 4.27 लाख करोड़ रुपये भेजे जा चुके हैं. यह रकम फसल की बुवाई के वक्त खाद और बीज खरीदने में किसानों की बड़ी मदद करती है. वहीं दूसरी ओर, 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' ने कुदरती आपदाओं के डर को कम किया है. किसानों के 1.90 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के क्लेम निपटाए जा चुके हैं, जो संकट की घड़ी में उनके लिए एक मजबूत सहारा साबित हुए हैं.
सरकार का कहना है कि अब इस बात पर जोर है कि कम लागत में ज्यादा पैदावार कैसे ली जाए. 'सॉइल हेल्थ कार्ड' के जरिए किसानों को उनकी जमीन की सेहत का पता चल रहा है, जिससे वे जरूरत के हिसाब से ही खाद का इस्तेमाल कर रहे हैं. सिंचाई के क्षेत्र में 'प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना' के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर तकनीक को बढ़ावा दिया जा रहा है, ताकि पानी की एक-एक बूंद का सही इस्तेमाल हो सके. इसके अलावा, देशभर में 27,000 से ज्यादा 'कस्टम हायरिंग सेंटर' खोले गए हैं, जहां छोटे और सीमांत किसान भी आधुनिक मशीनें किराए पर लेकर अपनी खेती को आसान बना रहे हैं.
किसान की सबसे बड़ी मुश्किल अपनी फसल को सही दाम पर बेचना रही है. इस समस्या का हल करने के लिए 'ई-नाम' जैसा डिजिटल प्लेटफॉर्म गेम-चेंजर साबित हुआ है. आज 1.8 करोड़ से ज्यादा किसान और सवा दो लाख से ज्यादा व्यापारी एक ही प्लेटफॉर्म पर जुड़े हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म हो रही है और पारदर्शिता बढ़ रही है. साथ ही, 10,000 किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) के गठन से छोटे किसानों की मोलभाव करने की ताकत बढ़ी है. अब किसान मिलकर अपनी फसल की प्रोसेसिंग और मार्केटिंग कर रहे हैं, सरकार का कहना है कि भंडारण के लिए बनाए जा रहे हजारों नए गोदामों ने भी फसल की बर्बादी को रोकने में बड़ी भूमिका निभाई है.
केंद्र सरकार का कहना है कि आने वाला वक्त 'सस्टेनेबल' यानी टिकाऊ खेती का है. भारत अब प्राकृतिक खेती की तरफ तेजी से कदम बढ़ा रहा है, जिसमें रसायनों का इस्तेमाल कम और प्रकृति का सम्मान ज्यादा है. 15 लाख से ज्यादा किसान पहले ही इस मुहिम से जुड़ चुके हैं. दालों और तिलहन के मामले में 'आत्मनिर्भर' बनने के लिए विशेष मिशन शुरू किए गए हैं, ताकि हमें विदेशों पर निर्भर न रहना पड़े. अनाज की सरकारी खरीद की व्यवस्था को भी इतना मजबूत कर दिया गया है कि करोड़ों लोगों को 'वन नेशन वन राशन कार्ड' के जरिए देश में कहीं भी अनाज मिल रहा है. यह पूरी कवायद न केवल संयुक्त राष्ट्र के 'जीरो हंगर' लक्ष्य को पूरा करती है, बल्कि एक ऐसे समृद्ध भारत की नींव रखती है.