
राजस्थान में खरीफ मूंग की खरीद शुरू हो चुकी है. खरीफ सीजन में मूंग (हरी दाल) का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य राजस्थान है. यहां 1 सितंबर से नई फसल से लगभग 63,000 टन मूंग की आवक हुई है. यह पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक है. 1-18 सितंबर के दौरान आवक 2025 में 6,451 टन और 2024 में 7,574 टन थी. हालांकि, किसानों को औसतन 7,452 रुपये प्रति क्विंटल का दाम मिला, जो 8,780 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से 15% कम है. 'एगमार्कनेट' (Agmarknet) पोर्टल के डेटा के अनुसार, अलग-अलग मंडियों में औसत कीमतें महीने की शुरुआत में लगभग 7,000 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर 17 सितंबर को 7,960 रुपये प्रति क्विंटल हो गईं.
'द हिंदू बिजनेसलाइन' की रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने 2026-27 सीजन के लिए सभी खरीफ फसलों में मूंग के MSP में सबसे कम, यानी 0.1% की बढ़ोतरी की है. किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट ने खरीद योजना की आलोचना करते हुए कहा कि इस साल मूंग के MSP में केवल 12 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है.
उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार को दिशानिर्देशों में बदलाव करना चाहिए—या तो नेफेड (Nafed) और NCCF को राज्यों के अनुरोध का इंतजार किए बिना खरीद करने की अनुमति दी जाए, या फिर खरीद की तारीखें और मात्रा तय करने की आजादी राज्यों को दी जाए. जाट ने बताया कि अगर MSP पर खरीद जल्दी शुरू हो जाती, तो किसान 14.4 करोड़ रुपये तक ज्यादा कमा सकते थे. अभी उन्हें 1,280 से 3,200 रुपये प्रति क्विंटल का नुकसान हो रहा है.
रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ 2025 में राजस्थान में मूंग का उत्पादन 13.89 लाख टन था, जो देश में इस फसल के कुल उत्पादन का 72% है. राज्य सरकार ने मौजूदा खरीफ सीजन के लिए मूंग की खेती का लक्ष्य 26.50 लाख हेक्टेयर तय किया था, क्योंकि 2025 में इसका रकबा बढ़कर 26.57 लाख हेक्टेयर हो गया था.
हालांकि, इस साल मूंग की बुआई का रकबा लक्ष्य से 13% कम, यानी 23.17 लाख हेक्टेयर रहा. एक और स्थानीय किस्म 'मोठ' भी 10 लाख हेक्टेयर के लक्ष्य को हासिल नहीं कर पाई और इस साल इसका रकबा 9.12 लाख हेक्टेयर रहा, जो 2025 के 8.59 लाख हेक्टेयर से अधिक है.
सहकारी एजेंसी 'नेफेड' (Nafed) पिछले सालों की मूंग 6,500 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बेच रही है, जिससे मौजूदा बाजार भाव MSP से नीचे आ गए हैं. किसान कई सालों से राज्य और केंद्र सरकारों से मूंग की खरीद 1 सितंबर से शुरू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन बार-बार की अपीलों को नहीं माना गया है.
जाट ने सुझाव दिया कि जहां आर्थिक रूप से फायदेमंद हो, वहां किसानों को दूसरी फसलें उगाने के लिए मनाया जा सकता है, क्योंकि कम रकबे से उन्हें बेहतर दाम मिल सकते हैं. उन्होंने खरीद व्यवस्था की भी आलोचना की और सवाल उठाया कि अगर फसलें जल्दी तैयार हो जाएं, तो क्या किसानों को सरकार द्वारा खरीद का सीजन घोषित करने तक इंतजार करना चाहिए.