Sugarcane Payment: गन्ना किसानों के बकाया ने तोड़े रिकॉर्ड, एक साल में 32 गुना का इजाफा, इस राज्य पर पड़ी बड़ी मार

Sugarcane Payment: गन्ना किसानों के बकाया ने तोड़े रिकॉर्ड, एक साल में 32 गुना का इजाफा, इस राज्य पर पड़ी बड़ी मार

एक हालिया संसदीय समिति की रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले एक साल में गन्ना किसानों का बकाया 32 गुना बढ़ गया है. 2023–24 में बकाया ₹34 करोड़ था, जो अब ₹16,087 करोड़ से ज़्यादा हो गया है. कर्नाटक के किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, जहाँ बकाया ₹4,956 करोड़ पहुँच गया है. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र पर भी भारी बकाया है. मिल मालिक नकदी की कमी, चीनी की गिरती कीमतें और बिना बिका स्टॉक इसे बढ़ने का कारण बताते हैं. किसान संगठनों का कहना है कि सरकार के प्रयास तब तक नाकाफी रहेंगे, जब तक भुगतान सीधे बैंक खातों में नहीं पहुंचे.

गन्ना बकाया का पहाड़, देश के किसान बेहालगन्ना बकाया का पहाड़, देश के किसान बेहाल
क‍िसान तक
  • नई दिल्ली,
  • Apr 01, 2026,
  • Updated Apr 01, 2026, 12:09 PM IST

देशभर के गन्ना किसानों के भुगतान को लेकर संसद की 'उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण समिति' ने बेहद चिंताजनक रिपोर्ट पेश की है. वरिष्ठ सांसद कनिमोझी की अधिग्रहण वाली इस समिति ने खुलासा किया है कि चीनी मिलों पर किसानों का बकाया पिछले एक साल में 32 गुना तक बढ़ गया है. जहां साल 2024-25 में यह बकाया महज 497 करोड़ रुपया था और साल 2023-24 में यह बकाया महज 34 करोड़ रुपया थी, वहीं 16 फरवरी 2026 तक यह आंकड़ा 16,087 करोड़ रुपया के पार पहुंच गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, सीजन 2025-26 के कुल बकाया भुगतान का लगभग 20% हिस्सा अभी भी मिलों के पास दबा पड़ा है, किसानों की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि अगली फसल की कटाई का वक्त करीब आ चुका है और उनके पास पिछली मेहनत की कमाई भी हाथ में नहीं आई है यह स्थिति आमदनी है कि गन्ना सेक्टर इस साल फसलों की भारी किल्लत है, जिसका सीधा खामियाजा किसान को निकल पड़ रहा है.

वही चीनी मिल मालिकों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों में आई गिरावट और निर्यात में कमी के कारण उनके पास नकदी भारी किल्लत हो गई है. मिलों के पास चीनी का भारी स्टॉक जमा है जिसे वे बेच नहीं पा रहे हैं.

गन्ना किसानों का एक साल में 32 गुना बढ़ा बकाया

बकाया राशि को लेकर सबसे हैरान कर देने वाली स्थिति कर्नाटक में देखने को मिली है, जहाँ-पिछले दो वर्षों में कोई बकाया न होने के बावजूद-अब यह आंकड़ा बढ़कर ₹4,956 करोड़ तक पहुंच गया है. महाराष्ट्र में भी स्थिति कुछ अलग नहीं है, जहाँ इस समय ₹4,252 करोड़ की भारी-भरकम राशि बकाया है. उत्तर प्रदेश में तो हालात और भी बदतर हैं, जहाँ पिछले साल की तुलना में बकाया राशि दस गुना बढ़ गई है और ₹3,287 करोड़ तक पहुँच गई है. इसी तरह, गुजरात में भी बकाया राशि ₹5 करोड़ से बढ़कर ₹1,402 करोड़ हो गई है. अन्य राज्यों की बात करें तो, मिलों की ओर से पंजाब के किसानों का ₹535 करोड़, हरियाणा के किसानों का ₹373 करोड़ और मध्य प्रदेश के किसानों का ₹366 करोड़ बकाया है. उत्तराखंड (₹235 करोड़), बिहार (₹212 करोड़), तमिलनाडु (₹203 करोड़) और तेलंगाना (₹152 करोड़) जैसे राज्यों में भी किसानों को अपनी कमाई वसूलने की बेताब कोशिश में मिलों के बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं. इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में भी किसानों को अपनी कड़ी मेहनत का फल पाने के लिए मिलों के पीछे भागने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

मिलों की बेरुखी और गिरती कीमतों ने बिगाड़ा गणित

चीनी मिल मालिकों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों में आई गिरावट और निर्यात में कमी के कारण उनके पास नकदी  भारी किल्लत हो गई है. मिलों के पास चीनी का भारी स्टॉक जमा है जिसे वे बेच नहीं पा रहे हैं. दूसरी ओर, किसान नेताओं का कहना है कि लागत बढ़ने और फसलों में बीमारी लगने से किसान पहले ही परेशान हैं. इसके अतिरिक्त, अमेरिका के साथ हुए व्यापारिक समझौतों ने भी किसानों के मन में भविष्य की कीमतों को लेकर खौफ पैदा कर दिया है, जिससे गन्ना सेक्टर में छाई सुस्ती ने किसानों की कमर तोड़ दी है.किसान नेताओं का कहना है अगर मिलों को घाटा हो रहा है, तो उसका खामियाजा  सिर्फ गरीब किसान ही क्यों भुगते? उत्तर प्रदेश के किसानों का कहना है कि फसलों में बीमारी लगने से लागत बढ़ गई किसानों के मन में एक डर) पैदा कर दिया है कि भविष्य में उनकी फसल की कोई कद्र नहीं रहेगी.  क्योकि  चीनी मिलो के पास  का भारी स्टॉक जमा है जिसे वे बेच नहीं पा रहे हैं, और इसी सुस्ती की वजह से किसानों का भुगतान अधर में लटका हुआ है.

समाधान की सुस्त रफ्तार और किसानों का बढ़ता संकट

संसदीय पैनल की जांच में यह बात निकलकर आई है कि भारत में हर साल लगभग 300-330 लाख मीट्रिक टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि देश की जरूरत (खपत) सिर्फ 270-290 लाख मीट्रिक टन है. इस अतिरिक्त चीनी की वजह से मिलों के पास पैसा फंस जाता है और वे किसानों को पेमेंट नहीं कर पातीं. इस मसले  को सुलझाने के लिए सरकार ने कुछ कदम उठाने का दावा किया है. सरकार अब चीनी मिलों को इस बात के लिए प्रोत्साहित  कर रही है कि वे अतिरिक्त गन्ने का इस्तेमाल चीनी बनाने के बजाय 'इथेनॉल' बनाने में करें. इसके साथ ही, चीनी का न्यूनतम समर्थन मूल्य  29 रूपयॆ से बढ़ाकर 31 प्रति किलो कर दिया गया है. हालांकि, किसान संगठनों का मानना है कि ये तमाम कोशिशें तब तक नाकाफी हैं जब तक कि किसानों के बैंक खातों में उनका पुराना बकाया पैसा नहीं आ जाता. सरकार को फौरन हस्तक्षेप कर मिलों को सख्त निर्देश देने होंगे, वरना आने वाले वक्त में गन्ने की खेती से किसानों का मोहभंग हो सकता है.

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