ठंड में मेमनों को चाहिए प्यारबकरी पालन में एक बड़ा और मुश्किल काम है बच्चों को बीमारी से बचाना. बकरी के बच्चों की मृत्यु दर को कम करना. क्योंकि करी पालन में मुनाफा तभी होगा जब बकरी के दिए हुए बच्चे जिंदा बचेंगे. गोट एक्सपर्ट की मानें तो तीन से चार महीने के होने पर ही बच्चे मुनाफा देना शुरू कर देते हैं. लेकिन जरूरी ये है कि जन्म के बाद से तीन-चार महीने की उम्र तक उन्हें तमाम तरह की बीमारियों और विपरीत मौसम से बचाया जाए. क्योंकि विपरीत मौसम के चलते बच्चे जल्दी-जल्दी बीमार पड़ते हैं.
बाड़े में बकरी के बच्चों की मृत्यु दर को कम कर पाना या फिर रोक पाना बड़ा ही मुश्किल काम होता है. बकरी के बच्चों को मुनाफा ऐसे ही नहीं कहा जाता है. नस्लीय बकरी का एक बच्चा जब दो से तीन महीने का हो जाता है कि बाजार में उसकी कीमत चार से पांच हजार रुपये तक हो जाती है. और अगर आपने एक साल तक उस बच्चे को अपने यहां पाल लिया तो फिर बकरा होने पर वो 15 हजार रुपये तक का बिक जाता है.
गोट एक्सपर्ट का कहना है कि 10 अप्रैल से लेकर और 15 जून तक ये वो वक्त है जब बकरियां प्राकृतिक रूप से हीट में आती हैं. ऐसे में पशुपालक अपनी बकरियों को सुबह-शाम चेक करते रहें. क्योंकि अप्रैल से लेकर जून तक जिन बकरियों को गाभिन कराया जाएगा उससे सितम्बर से बच्चा मिलना शुरू हो जाएगा.
इससे होगा ये कि सितम्बर-अक्टूबर में बच्चा मिलने से एक तो बच्चा बारिश में होने वाली बीमारियों से बच जाएगा. वहीं सितम्बर-अक्टूबर में बच्चा होने से दिसम्बर-जनवरी की कड़ाके की सर्दी तक बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाता है. जिससे सर्दी में होने वालीं मौसमी बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार हो जाता है.
इसी तरह से अगर बकरी को अक्टूबर से नवंबर के बीच गाभिन कराएंगे तो वो मार्च-अप्रैल में बच्चा दे देगी. मार्च-अप्रैल में बच्चा मिलने से वो सर्दी से बच जाएगा. साथ ही मई-जून की गर्मियों और आने वाले बारिश के महीने तक बीमारियों से लड़ने लायक तैयार हो जाएगा. गोट एक्सपर्ट का कहना है कि बकरियों को गाभिन कराए जाने वाले कैलेंडर का पालन करने से बकरियों के शेड में बच्चों की मृत्यु दर को जीरो किया जा सकता है.
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