
हाल ही में हुए खरीफ सम्मेलन में इस बात पर गंभीर मंथन हुआ कि खाद्य तेलों के मामले में भारत की विदेशों पर निर्भरता को कैसे खत्म किया जाए. इस बैठक में दो बेहद लाजवाब और सही लॉजिक वाली बातें सामने आईं- पहली यह कि देश के भीतर ही खाद्य तेल का घरेलू उत्पादन तेजी से बढ़ाया जाए, और दूसरी यह कि हम सब अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में तेल की खपत को थोड़ा कम और संतुलित करें.यह कदम हमारी सेहत और देश की जेब दोनों के लिए बेहद जरूरी है, क्योंकि भारत इस वक्त दुनिया में खाद्य तेल का सबसे बड़ा इंपोर्टर बन चुका है. अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए हम हर साल अरबों रुपये का विदेशी मुद्रा भंडार बाहर भेज रहे हैं. आज जहां ICMR के मुताबिक एक इंसान को साल में 12 किलो और WHO के अनुसार 13 किलो से ज्यादा तेल नहीं खाना चाहिए, वहीं भारत में प्रति व्यक्ति तेल की औसतन खपत आज 20 किलो के आंकड़े को पार कर चुकी है.
हैरानी की बात यह है कि हमारे पास दुनिया की करीब 20 फीसदी तिलहन उगाने वाली जमीन तो है, लेकिन कम पैदावार की वजह से वैश्विक उत्पादन में हमारा हिस्सा सिर्फ 6 से 7 फीसदी ही है. इसी अंतर के चलते हम अपनी जरूरत का लगभग 59 फीसदी तेल विदेशों से मंगाने को मजबूर हैं. साल 2010 में जहां हमारा इंपोर्ट 90 लाख टन था, वहीं 2025 में यह बढ़कर 160 लाख टन हो चुका है. देश की गाढ़ी कमाई को बाहर जाने से रोकना हमारी अर्थव्यवस्था और किसानों की तरक्की के लिए बहुत जरूरी है.
सरकार का मानना है कि अगर हिंदुस्तान को खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनना है, तो पाम ऑयल ही सबसे भरोसेमंद हथियार है. साल 2010 से 2025 तक के कृषि आंकड़े गवाही देते हैं कि सरसों, सोयाबीन या मूंगफली जैसी पारंपरिक फसलें जितनी जमीन घेरती हैं, उसके मुकाबले बेहद कम तेल देती हैं. इसके उलट, पाम ऑयल की प्रति हेक्टेयर तेल देने की क्षमता दूसरी फसलों से सीधे 5 गुना ज्यादा है. चूंकि यह एक बारहमासी फसल है, इसलिए इसे एक बार लगाने के बाद किसान सालों-साल बिना किसी झंझट के पैदावार ले सकते हैं. कम लागत में तैयार होने वाली इस फसल में खराब मौसम, मुश्किल जलवायु और छुट्टा पशुओं के नुकसान को झेलने का माद्दा भी दूसरी फसलों से कहीं बेहतर होता है. किसानों के लिए यह खेती घाटे को मुनाफे में बदलने की पूरी गारंटी है, क्योंकि इसका पौधा रोपने के ठीक चौथे साल से फल देना शुरू कर देता है और पूरी तरह सेट होने पर अच्छी देखरेख में प्रति हेक्टेयर हर साल 4 से 6 टन तक कच्चा पाम ऑयल (CPO) आसानी से दे देता है.
पाम ऑयल की खेती किसानों को दोहरा फायदा पहुंचाती है. भारत सरकार के हॉर्टिकल्चर कमिश्नर प्रभात कुमार के मुताबिक, शुरुआत के 4 सालों में जब तक इसके पौधे बड़े हो रहे हों, किसान खाली जमीन के बीच में कोको, केला, मक्का, अदरक और सूरजमुखी जैसी फसलें उगाकर एक्स्ट्रा कमाई कर सकते हैं. यह तरीका मिट्टी की ताकत बनाए रखने और खरपतवार को रोकने में भी मददगार है. इसके फल के गूदे से खाने का तेल और बीज से चॉकलेट, आइसक्रीम और कॉस्मेटिक्स का तेल बनता है. इसके अलावा, यह पर्यावरण के लिए भी एक बेहतरीन और टिकाऊ मॉडल है. इस फसल से निकलने वाले बायोमास को फेंकने के बजाय केंचुआ खाद में बदला जा सकता है, जिससे खेतों में महंगी रासायनिक खादों का खर्च 30 से 40 फीसदी तक कम हो जाता है. साथ ही, इसके बाकी बचे उप-उत्पादों का इस्तेमाल बेहतरीन पशु आहार, कागज इंडस्ट्री और बायोफ्यूल के रूप में भी खूब किया जा रहा है. ऐसे में इस फसल का हर हिस्सा किसानों के लिए 'कचरे से कंचन' साबित हो रहा है.
भारत सरकार भी यह बात अच्छी तरह जान चुकी है कि बिना पाम ऑयल के खाद्य तेल में आत्मनिर्भरता का सपना अधूरा है, इसीलिए 'राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-पाम ऑयल' के तहत सरकार किसानों पर खुलकर पैसा और मदद बरसा रही है. सरकार के मुताबिक, इस मिशन के तहत अब तक 2.73 लाथ हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जा चुका है. पाम ऑयल के पौधों के लिए मिलने वाली सरकारी मदद को 12,000 रुपये प्रति हेक्टेयर से सीधे बढ़ाकर 29,000 रुपये प्रति हेक्टेयर कर दिया गया है. साथ ही, पुराने बागों को नया जीवन देने के लिए 250 रुपये प्रति पौधा की विशेष नकद मदद भी दी जा रही है. वर्तमान में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना देश का 98 फीसदी पाम ऑयल संभालते हैं, लेकिन अब कर्नाटक, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, ओडिशा और गुजरात के साथ-साथ पूर्वोत्तर के राज्यों असम, अरुणाचल, त्रिपुरा में भी इसका दायरा तेजी से फैल रहा है. इसी का नतीजा है कि 2014-15 में जहां महज 1.91 लाख टन कच्चे पाम ऑयल का उत्पादन होता था, वह 2024-25 में बढ़कर 3.80 लाख टन हो गया है और देश में कुल रकबा 6.20 लाख हेक्टेयर तक जा पहुंचा है.
भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सरकार ने बेहद मजबूत और साफ लक्ष्य तय कर लिए हैं. हॉर्टिकल्चर कमिश्नर के मुताबिक इस मिशन का सबसे पहला टारगेट यह है कि साल 2026 में देश में पाम ऑयल की खेती के दायरे को बढ़ाकर 6.5 लाख हेक्टेयर के पार ले जाया जाय. आम लोगों को सेहत के प्रति जागरूक किया जा रहा है भारत हर साल करीब 40,000 करोड़ रुपये खर्च करके बाहर से 90 लाख टन पाम ऑयल मंगाता है, जो हमारे कुल खाने के तेल के इंपोर्ट का लगभग 56 फीसदी है. फिलहाल, सरकार के अनुसार देश में इसकी खेती के लिए करीब 28 लाख हेक्टेयर जमीन की बेहतरीन संभावना मौजूद है, जिसमें से अब तक 6.20 लाख हेक्टेयर में खेती की जा चुकी है.अगर हम इस पूरे संभावित इलाके में पाम ऑयल की खेती करने में कामयाब हो जाते हैं, तो विदेशी तेल पर हमारी निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है, और विदेशों में जाने वाला देश का पैसा हमारे अपने किसानों के घरों को खुशहाल बना सकता है.