
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की ओर से जारी एक प्रशासनिक आदेश ने देश के कृषि वैज्ञानिकों और मीडिया के बीच 'सेंसरशिप' की दीवार खड़ी कर दी है. ICAR के सहायक महानिदेशक अनिल कुमार की ओर से जारी इस सर्कुलर में 'केंद्रीय सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964' का हवाला देते हुए वैज्ञानिकों के प्रेस/मीडिया से बात करने पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए हैं.
आदेश के अनुसार, अब कोई भी वैज्ञानिक या अधिकारी बिना सक्षम प्राधिकारी की 'पूर्व स्वीकृति' के मीडिया को ब्रीफिंग, स्टेटमेंट या बाइट नहीं दे सकेगा. दलील दी गई है कि इससे 'सटीक और प्रामाणिक' सूचना सुनिश्चित होगी, लेकिन जमीन पर इसका असर वैज्ञानिकों की 'जुबानबंदी' के रूप में दिख रहा है.
प्रधानमंत्री मोदी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का निरंतर जोर रहा है कि 'लैब की बात लैंड (खेत) तक' पहुंचनी चाहिए. यानी टैक्सपेयर के पैसे से जो रिसर्च हो रही है, उसका लाभ तुरंत किसान तक पहुंचे. लेकिन इस नए आदेश के डर से वैज्ञानिक पत्रकारों से बात तक करने से कतरा रहे हैं. वह इस आदेश का हवाला दे रहे हैं. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर वैज्ञानिक अपने रिसर्च, समय पर नई किस्मों, कीटों के हमले या मौसम के बदलाव पर जानकारी साझा नहीं करेंगे, तो किसान तक तकनीक कैसे पहुंचेगी और लैब टू लैंड का सपना कैसे साकार होगा?
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए जब हमने कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से बात की, तो उन्होंने इस पर स्पष्ट नाराजगी जताई. उन्होंने कहा कि ऐसा आदेश जारी नहीं होना चाहिए. अगर ऐसा हुआ है, तो यह पूरी तरह गलत है. इससे समाज और किसानों के बीच गलत संदेश जाएगा. कृषि मंत्री ने तुरंत अपने स्टाफ को निर्देश दिए हैं कि इस मामले की जांच की जाए और यह सुनिश्चित हो कि वैज्ञानिकों और किसानों के बीच संवाद की प्रक्रिया बाधित न हो. इसमें प्रेस की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है.
विशेषज्ञों का मानना है कि कृषि जैसे गतिशील क्षेत्र में 'आधिकारिक मंजूरी' की लंबी प्रक्रिया सूचना की प्रासंगिकता को खत्म कर देती है. एक तरफ सरकार पारदर्शिता की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ ICAR का यह 'अघोषित सेंसरशिप' वाला रवैया वैज्ञानिक समुदाय में असंतोष पैदा कर रहा है. बहरहाल, अब सबकी नजरें कृषि मंत्रालय पर हैं कि क्या शिवराज सिंह चौहान के दखल के बाद ICAR इस विवादित आदेश को वापस लेगा या इसमें कोई ढील दी जाएगी.