
मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों 'बासमती' चावल की खुशबू कम और सियासी टकराव की गर्माहट ज्यादा महसूस की जा रही है. मुद्दा है प्रदेश के 14 जिलों में पैदा होने वाले बासमती चावल को जीआई (Geographical Indication) टैग दिलाने का. यह लड़ाई अब खेतों से निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस और प्रधानमंत्री के दफ्तर तक जा पहुंची है. इस मुद्दे को लेकर राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्री आमने-सामने हैं. अभी तक मध्य प्रदेश में उगाए जाने वाले बासमती को जीआई टैग नहीं मिल सका है, जिसकी वजह से यहां के किसानों और व्यापारियों को नुकसान पहुंच रहा है. शुक्रवार को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एमपी की बासमती का केस कोर्ट में होने की बात कहकर जीआई टैग मामले पर पल्ला झाड़ लिया.
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह ने इस मामले में मोर्चा खोल दिया है. कुछ दिन पहले उन्होंने बासमती के जीआई टैग मामले को लेकर मध्य प्रदेश के किसानों के साथ सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाया था.
सिंह ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि प्रदेश के 14 जिलों के बासमती को तत्काल जीआई टैग दिया जाए. उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा, "यदि केंद्र सरकार और एपीडा (APEDA) हमारे बासमती को मान्यता नहीं देते हैं, तो मैं किसानों के हक के लिए अनशन पर बैठने से भी पीछे नहीं हटूंगा." उनका तर्क है कि जब मध्य प्रदेश के किसान उच्च गुणवत्ता वाला बासमती उगा रहे हैं, तो उन्हें 'बासमती' नाम इस्तेमाल करने से क्यों रोका जा रहा है?
दूसरी ओर, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने भोपाल स्थित आवास पर इस मुद्दे पर सरकार का पक्ष रखा. उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार किसानों के हितों के प्रति गंभीर हैं. इसकी जीआई टैग का मुद्दा पाकिस्तान के साथ भी जुड़ा है.
शिवराज सिंह चौहान ने कहा, "हम लगातार प्रयास कर रहे हैं कि मध्य प्रदेश के बासमती को वह पहचान मिले जिसका वह हकदार हैं. लेकिन वर्तमान में यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है. कानूनी प्रक्रियाओं के कारण ही अब तक जीआई टैग मिलने में देरी हुई है." उनका संकेत साफ था कि सरकार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठी है, लेकिन अदालती पेच के कारण रास्ता थोड़ा कठिन है.
विवाद की जड़ एपीडा (APEDA) की वह परिभाषा है, जिसके तहत बासमती का जीआई टैग केवल हिमालय की तलहटी वाले 7 राज्यों-पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, दिल्ली, उत्तराखंड, हिमाचल और जम्मू कश्मीर तक सीमित रखा गया है.
1. किसानों का नुकसान: जीआई टैग न होने से एमपी का किसान अपने चावल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में 'बासमती' के नाम से नहीं बेच पाता.
2. ब्रांडिंग की समस्या: टैग के अभाव में व्यापारियों को कम दाम मिलते हैं, जिसका सीधा असर किसान की जेब पर पड़ता है.
3. ऐतिहासिक दावा: मध्य प्रदेश का दावा है कि यहां दशकों से बासमती उगाया जा रहा है और इसकी गुणवत्ता किसी भी अन्य राज्य से कम नहीं है.
ग्वालियर, चंबल और मध्य क्षेत्र के 14 जिलों के हजारों किसानों की उम्मीदें अब इस कानूनी और राजनीतिक खींचतान पर टिकी हैं. एक तरफ दिग्विजय सिंह का आंदोलन का रास्ता है, तो दूसरी तरफ शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में केंद्र की कानूनी पैरवी.
देखना दिलचस्प होगा कि क्या बासमती की यह लड़ाई दिल्ली की दहलीज पर मध्य प्रदेश के किसानों को उनका वाजिब हक दिला पाएगी या फिर यह सियासी दांव-पेच की भेंट चढ़ जाएगी.