छोटी जोत की बढ़ती समस्या (AI Generated Image)अन्नदाता कहे जाने वाले भारतीय किसान की आर्थिक रीढ़ अब जमीन के लगातार छोटे होते टुकड़ों के बोझ तले दब रही है. जमीन बंटती जा रही है और किसानों की उम्मीद घटती जा रही है. भारत का किसान आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां उसकी मेहनत तो बढ़ रही है. लेकिन, जमीन का टुकड़ा लगातार छोटा होता जा रहा है. साल 1970 के दशक में जहां किसान के पास औसतन 2.28 हेक्टेयर खेती थी, वहीं आज यह बंटते-बंटते महज 0.96 हेक्टेयर की एक संकरी पट्टी बनकर रह गई है.
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा पेश किए गए ये आंकड़े केवल जमीन की कमी नहीं बताते, बल्कि उस 'आर्थिक संकट' की ओर इशारा करते हैं, जो अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे कृषि दिग्गजों के सामने भारतीय किसान को एक असमान युद्ध में खड़ा कर देता है.
भारत में खेतों का औसत रकबा गिरकर मात्र अब एक हेक्टेयर से भी कम रह गया है तो यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं है. दरअसल, यह ग्रामीण भारत की उस कड़वी हकीकत का आईना भी है, जहां बढ़ती जनसंख्या और पारिवारिक बंटवारे ने खेतों को 'लाभहीन' टुकड़ों में बदल दिया है. जब हम वैश्विक महाशक्तियों से तुलना करते हैं, तो यह संकट और भी गहरा नजर आता है.
पिछले पांच दशकों में भारतीय खेतों का आकार जिस रफ़्तार से सिकुड़ा है, वह नीति-निर्माताओं के लिए चिंता का विषय है. देखिए कब भारत के किसानों के पास कितनी औसत जमीन थी.
• 1970-71: 2.28 हेक्टेयर
• 1980-81: 1.84 हेक्टेयर
• 2010-11: 1.15 हेक्टेयर
• 2015-16: 1.08 हेक्टेयर
• वर्तमान स्थिति: 0.96 हेक्टेयर
• 2047 तक यह 0.6 हेक्टेयर रह सकता है.
कृषि मंत्री ने जिक्र किया कि वैश्विक प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले भारतीय किसान कितने छोटे पायदान पर खड़ा है. ऑस्ट्रेलिया में खेत का औसत आकार लगभग 2,384, कनाडा में 332, अमेरिका में 190 और ब्राजील में लगभग 300 हेक्टेयर है. इतने बड़े फार्मों पर उन्नत मशीनीकरण और 'इकोनॉमी ऑफ स्केल' का लाभ मिलता है, जबकि भारत में चुनौती यह है कि 1 हेक्टेयर से कम जमीन पर ट्रैक्टर चलाना भी महंगा पड़ता है.
मंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनुसार, अब सिर्फ गेहूं-धान उगाने से परिवार का गुजारा संभव नहीं है. उन्होंने इसके लिए एक 'इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल' और विविधीकरण (Diversification) का रोडमैप पेश किया है. इसलिए हर सूबे का कृषि रोडमैप बनाया जा रहा है.
1. सहकारी खेती की सीख: अतीत में सहकारी खेती के प्रयोगों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, इसलिए अब नए मॉडलों पर विचार जरूरी है.
2. सहायक गतिविधियां: छोटे किसानों को पशुपालन, मछली पालन, मधुमक्खी पालन और बागवानी (Horticulture) जैसे क्षेत्रों से जुड़ना होगा. सिर्फ अनाजों की खेती से अब आय नहीं बढ़ेगी.
3. FPO का संगठन: किसान उत्पादक संगठन के माध्यम से छोटे किसानों को एकजुट कर उनकी मोलभाव करने की शक्ति बढ़ाना.
4. आईसीएआर (ICAR) के वैज्ञानिकों से 'लैब से खेत' की दूरी कम करने और कम पानी में अधिक उत्पादन वाली किस्मों पर जोर देने को कहा गया है.
यानी छोटी जोत बड़ा चैलेंज है. भारत की करीब 46% आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है. अगर हमें 2047 तक 'विकसित भारत' बनाना है तो इस 0.96 हेक्टेयर की चुनौती को आधुनिक तकनीक, महंगी फसलों खेती और दाम की गारंटी के साथ ही निपटा जा सकता है.
Copyright©2026 Living Media India Limited. For reprint rights: Syndications Today