पंजाब-हरियाणा में सूखते कुएं और तालाब, महंगी सिंचाई से परेशान किसान, कई फसलें खतरे में

पंजाब-हरियाणा में सूखते कुएं और तालाब, महंगी सिंचाई से परेशान किसान, कई फसलें खतरे में

पंजाब और हरियाणा में तेजी से गिरते भूजल स्तर ने खेती, पीने के पानी और किसानों की आजीविका पर गंभीर संकट खड़ा कर दिया है. बढ़ती लागत, सूखती फसलें और जलवायु बदलाव के बीच किसान आंदोलन कर रहे हैं और समाधान की मांग कर रहे हैं.

Punjab Groundwater CrisisPunjab Groundwater Crisis
कमलजीत संधू
  • चंडीगढ़/फाजिल्का/संगरूर/चरखी दादरी,
  • Jun 11, 2026,
  • Updated Jun 11, 2026, 11:57 AM IST

पंजाब और हरियाणा के खेतों में हरियाली के पीछे अब एक बड़ा संकट छिपा हुआ है. कभी हरित क्रांति का आधार रहा भूजल अब तेजी से खत्म हो रहा है. लगातार धान‑गेहूं की खेती, ट्यूबवेल का ज्यादा इस्तेमाल, खराब नहर व्यवस्था, औद्योगिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने पानी का स्तर नीचे धकेल दिया है. आज हालात ऐसे हैं कि किसानों को पानी के लिए 200 से 400 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है. इससे उनकी लागत कई गुना बढ़ गई है और छोटी जोत वाले किसान कर्ज में डूब रहे हैं.

फाजिल्का में सूखे नहर, मरते किन्नू बाग और विरोध

पंजाब के फाजिल्का जिले के गांवों में पानी की कमी को लेकर किसान सड़कों पर उतर आए हैं. गांव बोहर और कलर खेड़ा में किसानों ने ढोल बजाकर प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन किया है. किसानों का कहना है कि नहर का पानी टेल एंड (आखिरी गांवों) तक नहीं पहुंच रहा. इससे किन्नू के बाग सूख रहे हैं और पीने के पानी की भी कमी हो रही है. किसानों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो आंदोलन और तेज होगा.

संगरूर और मानसा में बढ़ती गहराई, बढ़ता खर्च

पंजाब के मानसा और संगरूर में भूजल स्तर लगातार गिर रहा है. पहले जहां ट्यूबवेल लगाने में 30-40 हजार रुपये खर्च होते थे, अब वही काम 1-2 लाख रुपये में हो रहा है. किसान बताते हैं कि हर साल पानी नीचे जा रहा है, जिससे उन्हें नई पाइपें लगानी पड़ रही हैं. संगरूर के किसान मनप्रीत सिंह कहते हैं, “आज सब कुछ सबमर्सिबल पंप पर निर्भर है. अगर पानी और नीचे गया, तो आने वाली पीढ़ी के पास क्या बचेगा?”

धान और बासमती से कमाई भी, संकट भी

पंजाब का बासमती चावल देश-विदेश में मशहूर है और इससे किसानों को अच्छी कमाई होती है. लेकिन एक किलो चावल तैयार करने में करीब 4000-5000 लीटर पानी लगता है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार पंजाब में भूजल का इस्तेमाल उसकी भरपाई से कहीं ज्यादा है. राज्य के 100 से ज्यादा इलाके ‘डार्क जोन’ बन चुके हैं, जहां पानी खत्म होने की स्थिति में है.

हरियाणा के चरखी दादरी में रेगिस्तान बनने का खतरा

चरखी दादरी में पानी का स्तर हर साल 10-15 फीट तक गिर रहा है. किसानों के मुताबिक पहले पानी 100 फीट पर मिल जाता था, अब 350-400 फीट तक जाना पड़ता है. ट्यूबवेल लगाने का खर्च 10 लाख रुपये तक पहुंच गया है. किसान नेताओं का कहना है कि पानी खारा और जहरीला हो गया है, जिससे बीमारियां भी बढ़ रही हैं.

रोहतक और सोनीपत में पानी है, पर बेकार

रोहतक में नहरों से सिंचाई और 1995 की बाढ़ के कारण अजीब बात है कि जलस्तर ऊपर आया है (अब सांपला, महम जैसी जगहों पर 5-25 फीट है), लेकिन पानी ज्यादातर खारा है—जो पीने या सिंचाई के लायक नहीं है. भूजल सेल के दलबीर सिंह जैसे अधिकारी बताते हैं कि धान की खेती बढ़ने के साथ मीठे पानी (1985 में 30-40 फीट) की स्थिति बदली है. प्रीतम सिंह (दोभ गांव) और रामपाल सुहाग जैसे किसान नेता इस बात की पुष्टि करते हैं कि पानी की खराब क्वालिटी के कारण नहरों पर निर्भरता बनी हुई है.

पास के सोनीपत में, कुंडली, राई, मुरथल, गन्नौर और खरखौदा के पास के गांवों में पीने के पानी की भारी कमी है और फैक्टरियों के कचरे से पानी दूषित हो रहा है. लोग नहरों के पास हैंडपंपों पर लाइन लगाते हैं, कभी-कभी 15 किमी दूर तक जाते हैं. पशुपालन कम हो गया है. 

सरकार की प्रतिक्रिया और आगे की राह 

हरियाणा के विकास और पंचायत मंत्री कृष्ण लाल पंवार ने पंचकूला में कई कदमों की घोषणा की. 39 डार्क जोन की पहचान की गई है, पानी के स्तर को संतुलित करने के लिए नहरों के पास ट्यूबवेल लगाने की योजना है, कुल 19,000 तालाबों में से गाद (silt) से प्रभावित 9,000 तालाबों में से 2,200 की सफाई और सौंदर्यीकरण किया जाएगा, और ज्यादा ट्रैक्टरों के साथ ग्रामीण स्वच्छता में सुधार किया जाएगा.

फिर भी किसान और विशेषज्ञ और ज्यादा की मांग कर रहे हैं. मोटे अनाज (millets) और कम पानी वाली फसलों के लिए गारंटीड MSP, समय पर 'वाराबंदी' (पानी के बंटवारे की प्रणाली) के साथ मजबूत नहर नेटवर्क, औद्योगिक कचरे (effluent) का कड़ाई से ट्रीटमेंट, बड़े पैमाने पर रिचार्ज स्ट्रक्चर, और बासमती के GI टैग और निर्यात की सुरक्षा करते हुए कम पानी वाली किस्मों पर रिसर्च. नितिन यादव ने बासमती के रिकॉर्ड निर्यात के बीच टिकाऊ खेती के तरीकों पर जोर दिया.

विशेषज्ञों की क्या है राय

विशेषज्ञों का कहना है कि इस संकट से निपटने के लिए धान की जगह कम पानी वाली फसलें उगानी होंगी. नहर व्यवस्था को मजबूत करना होगा, जल संरक्षण और रिचार्ज सिस्टम बढ़ाने होंगे और ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देना होगा. पानी की समस्या का समाधान तभी हो पाएगा.

सरकार के कदम और चुनौतियां

सरकार ने कई योजनाओं का ऐलान किया है, जैसे तालाबों की सफाई, नहरों को सुधारना और डार्क जोन की पहचान. लेकिन किसान कहते हैं कि जमीन पर ज्यादा काम नहीं दिख रहा है. इन सभी संकेतों से साफ है कि पंजाब और हरियाणा में भूजल संकट अब केवल किसानों की नहीं, बल्कि पूरे देश की खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा बन गया है. अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में खेती और पानी दोनों पर बड़ा खतरा मंडरा सकता है.

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