
ICAR Promotion Reform: देश के सबसे बड़े कृषि अनुसंधान नेटवर्क 'भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद' (ICAR) के तौर-तरीकों पर सरकार ने सबसे बड़ा चाबुक चलाया है. अब तक एसी कमरों में बैठकर सिर्फ भारी-भरकम फाइलें और किताबी 'रिसर्च पेपर' चमकाकर प्रमोशन का फायदा उठाने वाले कृषि वैज्ञानिकों का खेल हमेशा के लिए खत्म होने जा रहा है. अब वैज्ञानिकों की तरक्की का रास्ता केवल भारी-भरकम डिग्रियों और पुराने रसूख से नहीं, बल्कि पद की व्यावहारिक जरूरतों और जमीनी काम से तय होगा. वैज्ञानिकों की कागजी जादूगरी पर पानी फेरते हुए इस नए सिस्टम को सीधे किसानों के हितों से जोड़कर जमीन पर उतार दिया गया है.
यह बदलाव केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की पहल पर हुआ है. उनका मानना है कि कृषि वैज्ञानिकों की रिसर्च तब तक बेकार है, जब तक उसका फायदा देश के आखिरी किसान के खेत तक न पहुंचे. यही वजह है कि 'लैब टू लैंड' के इस नारे को हकीकत में बदलने के लिए यह ऐतिहासिक बदलाव किया गया है. चौहान लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि वैज्ञानिकों की बड़ी-बड़ी डिग्रियां और बंद कमरों की रिसर्च फाइलों में बंद रहने के लिए नहीं हैं. देश के अन्नदाता को जब तक उसकी रोजमर्रा की समस्याओं, जैसे गन्ने के रेड रॉट या कपास की सुंडी से मुक्ति नहीं मिलेगी, तब तक किसी वैज्ञानिक को तरक्की की मलाई काटने का हक नहीं है. मंत्री के इस कड़े रुख ने वैज्ञानिकों को साफ संदेश दे दिया है कि अब तरक्की का पैमाना सिर्फ और सिर्फ किसान की तरक्की और उसकी खुशहाली ही होगा.
इस ऐतिहासिक बदलाव को पूरा करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के पूर्व अध्यक्ष प्रो. वेद प्रकाश की अगुवाई में जुलाई 2025 में एक उच्चस्तरीय कमेटी बनाई गई थी. आपस में बातचीत और जांच-पड़ताल के बाद कमेटी ने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसे अब पूरी तरह हरी झंडी दिखाते हुए लागू कर दिया गया है. सबसे क्रांतिकारी बदलाव यह है कि व्यक्तिगत पुरस्कारों के नंबर काटकर अब उन कर्मठ वैज्ञानिकों को रिमोट एरिया बोनस यानी अतिरिक्त बोनस नंबर दिया जाएगा जो दूरस्थ, पिछड़े और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में जाकर सीधे किसानों के बीच काम करते हैं और उनकी फसलों को बचाने में मदद करते हैं.
प्याज का सड़ना हो, आम-लीची की शेल्फ लाइफ बढ़ाना हो, गन्ने का रेड रॉट हो या कपास की गुलाबी सुंडी. इन सभी बुनियादी समस्याओं पर सालों से हमारे कृषि वैज्ञानिक फेल क्यों साबित हो रहे हैं? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि वैज्ञानिकों की रिसर्च केवल कंट्रोल्ड लैब्स, गमलों या उनके रिसर्च सेंटरों के छोटे से टुकड़ों तक ही सीमित रही. जब वही तकनीक मौसम की मार झेलते आम किसान के असली खेत में आती है, तो पूरी तरह बेअसर हो जाती है.
वैज्ञानिकों ने कभी भी इन बीमारियों का कोई स्थायी या पुख्ता जैविक तोड़ खोजने की कोशिश ही नहीं की. वे हर बार 'फसल की किस्म बदलने' का एक नया शॉर्टकट ढूंढ लाते हैं, जो 3-4 साल में खुद दम तोड़ देता है. मौलिक खोज करने के बजाय विदेशी तकनीकों को कॉपी-पेस्ट करना और किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के महंगे बीजों व जहरीले केमिकल्स के चक्रव्यूह में झोंक देना ही इन वैज्ञानिकों का असली विज्ञान बनकर रह गया है. यही वजह है कि अरबों के बजट के बाद भी किसान की समस्याएं आज भी वहीं की वहीं खड़ी हैं. कुछ वैज्ञानिकों को जल्दी जल्दी नेशनल अवार्ड देकर उन्हें बड़े पदों पर बैठाया गया. लेकिन अब यह सब खेल खत्म होगा. अब उन्हें किसानों के लिए काम करना होगा, तभी प्रमोशन का लाभ मिलेगा.
यह ऐतिहासिक और कड़ा फैसला देश की कृषि व्यवस्था की असली जरूरतों को देखकर और पुराने सिस्टम की कमियों को दूर करने के लिए लिया गया है. आईए समझते हैं कि नियमों को बदलने के पीछे की वजह क्या है?
पुराना सिस्टम पूरी तरह व्यक्ति-केंद्रित था, जहां वैज्ञानिक की बड़ी-बड़ी डिग्रियां और व्यक्तिगत उपलब्धियां देखकर उन्हें बड़े पदों पर बैठा दिया जाता था. अब इसे पद-केंद्रित बनाया गया है ताकि यह साफ हो सके कि वैज्ञानिक उस खास पद की जिम्मेदारियों और व्यावहारिक काम पर खरा उतरता है या नहीं.
पहले इंटरव्यू में होने वाले किसी भी तरह के प्रभाव या पैरवी का बोलबाला रहता था. पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के लिए अब स्कोरकार्ड और इंटरव्यू के बीच नंबरों का अनुपात पूरी तरह फिक्स कर दिया गया है.
वैज्ञानिक केवल अपनी प्रोफाइल चमकाने और थ्योरी वाले रिसर्च पेपर छापने में उलझे रहते थे. इस नए नियम का मकसद वैज्ञानिकों को लैब्स से बाहर निकालकर किसान-केंद्रित और उद्योगों की जरूरत के हिसाब से रिसर्च करने की तरफ मोड़ना है ताकि किसानों को सीधा फायदा मिले.
फसल विज्ञान, पशुपालन और जैव प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में बिखरी हुई रिसर्च के बजाय व्यावहारिक और जमीनी अनुसंधान को बढ़ावा देना है. इससे जलवायु परिवर्तन, पोषण सुरक्षा और जमीन व पानी के संकट जैसी गंभीर चुनौतियों के सटीक समाधान खोजे जा सकेंगे, जिससे किसानों की फसलें बर्बाद होने से बचेंगी.
इंटरव्यू में निष्पक्षता पक्की करने के लिए नंबरों के अनुपात को पदों के हिसाब से पूरी तरह फिक्स कर दिया गया है. लीडरशिव वाले पद (जैसे डायरेक्टर, डीडीजी) के लिए 70% स्कोरकार्ड के अंक और 30% इंटरव्यू के नंबर होंगे. सेमी लीडरशिप पदों पर 75% स्कोरकार्ड के अंक + 25% इंटरव्यू के नंबर होंगे. जबकि मूल वैज्ञानिक पदके लिए यह 80:20 के आधार पर तय होगा.
इसके साथ ही, चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता को पुख्ता करने के लिए पहली बार वैज्ञानिकों का साइकोलॉजिकल टेस्ट अनिवार्य किया गया है और जांच करने वाले एक्सपर्ट्स की ट्रेनिंग के लिए भी नियम बनाए गए हैं. यानी अब इंटरव्यू में चाहकर भी कोई किसी की मनमानी पैरवी नहीं कर पाएगा. कमेटी ने पुराने स्कोरकार्ड के उन हिस्सों पर सीधे कैंची चलाई है जहां वैज्ञानिक केवल खुद की प्रोफाइल चमकाकर नंबर बटोर लेते थे. कुल पांच श्रेणियों के स्कोरकार्ड निर्धारित किए गए हैं, जिनमें से दो शीर्ष श्रेणियों के नंबरों में यह भारी फेरबदल हुआ है.
डिप्टी डायरेक्टर जनरल (DDG) और निदेशक के पद के लिए मैनेजमेंट क्षमता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी. पुराने स्कोरकार्ड में 'नेतृत्व गुणों' के लिए केवल 16 नंबर निर्धारित थे. अब नए 'प्रबंधन एवं प्रशासनिक गुणों' को प्राथमिकता देते हुए इसके अंकों को बढ़ाकर 17.50 कर दिया गया है. अब वैज्ञानिकों को सिर्फ लैब संभालना नहीं, बल्कि संस्थान चलाना भी आना चाहिए.
सम्मान और पुरस्कारों के नाम पर मिलने वाले 14 नंबरों को घटाकर सीधे 12.60 कर दिया गया है. अब व्यक्तिगत उपलब्धियों के स्थान पर वैश्विक प्रासंगिकता और प्रदर्शन को उचित मान्यता मिलेगी. पहले 'प्रकाशन' के नाम पर सीधे 14 नंबर मिल जाते थे, जिसे घटाकर अब 10.50 कर दिया गया है. अब केवल साधारण पेपर छापने से नंबर नहीं मिलेंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त H-Index तथा उच्च इम्पैक्ट फैक्टर वाले प्रकाशनों को ही वेटेज दिया जाएगा.
पुराने स्कोरकार्ड में एडिशनल डायरेक्टर जनरल (ADG) और संयुक्त निदेशक के पद की श्रेणी के तहत मैनेजमेंट योग्यता जांचने का कोई कॉलम नहीं था (00 नंबर थे). अब नए नियम में 'प्रबंधन एवं प्रशासनिक गुणों' को जोड़कर सीधे 14.00 नंबर का भारी वेटेज दिया गया है. व्यक्तिगत उपलब्धियों और पुरस्कारों के नाम पर पहले सीधे 22 नंबर बटोरे जाते थे, जिसे अब बेरहमी से काटकर लगभग आधा यानी 11.90 कर दिया गया है. प्रकाशनों का वेटेज 16 से घटाकर 12.60 किया गया है. वहीं, पद-विशिष्ट अनुभव और विशेषज्ञता सुनिश्चित करने के लिए 'जरूरी योग्यताओं' का कॉलम जोड़कर इसे सीधे शून्य से 10.50 नंबर दिए गए हैं.
सवाल सीधा है कि जब देश में वैज्ञानिकों की इतनी बड़ी फौज बैठी है और हर साल रिसर्च के नाम पर अरबों का बजट पानी की तरह बहाया जाता है, तो फिर आज भी भारत का अन्नदाता समस्याओं से क्यों जूझ रहा है? क्यों उसकी हाड़-तोड़ मेहनत खेतों में ही दम तोड़ देती है? इस पूरे नीतिगत फेरबदल का असल मकसद आईसीएआर की संगठनात्मक संस्कृति को पूरी तरह किसान-केंद्रित बनाना है ताकि वैज्ञानिकों की हर खोज सीधे किसान के खेत और उसकी आमदनी से जुड़े.
वैज्ञानिकों को नंबर केवल तभी मिलेंगे जब उनके नए प्रयोगों का व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव जमीन पर किसानों के जीवन में दिखेगा. इसके साथ ही, एजुकेशन, तालमेल और एक्सटेंशन जैसी अतिरिक्त महत्वपूर्ण गतिविधियों को भी अधिक वेटेज प्रदान किया गया है, ताकि नई तकनीक सीधे किसानों के खेतों तक पहुंच सके. यह रूपरेखा फसल विज्ञान, पशुपालन, मत्स्य पालन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जैव प्रौद्योगिकी, डिजिटल कृषि तथा सामाजिक-आर्थिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में व्यावहारिक और जमीनी अनुसंधान को प्रोत्साहित करेगी.
यह ऐतिहासिक सुधार केवल नंबरिंग का बदलाव नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों की जवाबदेही तय करने का जरिया है. अब कृषि वैज्ञानिकों को सिर्फ 'नौकरी' नहीं, बल्कि 'नतीजे' देने होंगे. नया स्कोरकार्ड लागू हो चुका हैया तो खेतों में उतरकर किसानों की फसलों की बर्बादी रोकिए और वर्ष 2047 तक 'विकसित भारत' के निर्माण के राष्ट्रीय संकल्प में सार्थक योगदान दीजिए, अन्यथा तरक्की की उम्मीद छोड़ दीजिए
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