
देश की खेती में हर साल हजारों टन पेस्टिसाइड का इस्तेमाल हो रहा है. बड़ी एग्रोकेमिकल कंपनियां हर सीजन किसानों के लिए नए-नए पेस्टिसाइड बाजार में लाती है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन रसायनों का असर आखिर किसानों, मिट्टी और हमारी थाली तक पहुंचने वाले भोजन पर कितना पड़ रहा है? एक तरफ सरकार प्राकृतिक खेती और जैविक कृषि को बढ़ावा देने के दावे करती है, तो दूसरी तरफ कई जगहों पर बैन कीटनाशकों के इस्तेमाल की खबरें लगातार सामने आती रहती हैं. आखिरकार जिम्मेदारी किसकी है? कंपनियों की, निगरानी करने वाली एजेंसियों की या पूरे सिस्टम की? इन्हीं सवालों को बड़े पर्दे पर उठाने की कोशिश करती है फिल्म 'द इंडिया स्टोरी', जो आज यानी 24 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है. यह फिल्म खेती में बढ़ते रासायनिक कीटनाशकों और उनसे पड़ने वाले सेहत पर असर को लेकर एक नई बहस छेड़ने का प्रयास करती है.
फिल्म ऐसे समय में आई है, जब देश में खाद्य सुरक्षा, फलों और सब्जियों में पेस्टिसाइड की अधिक मात्रा और प्राकृतिक खेती जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है. जरूरत इस बात की है कि कीटनाशकों की बिक्री और इस्तेमाल पर अच्छे से निगरानी हो, किसानों को सही प्रशिक्षण मिले और बाजार में बिकने वाले खाने की चीजों की नियमित जांच की जाए, ताकि खेत से लेकर थाली तक सुरक्षा बनी रहे.
'द इंडिया स्टोरी' एक कोर्टरूम ड्रामा है, लेकिन इसकी कहानी केवल अदालत तक सीमित नहीं रहती. यह दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि खेतों में इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड का असर आखिर हमारी थाली तक कैसे पहुंचता है. फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या उत्पादन बढ़ाने की होड़ में कहीं लोगों की सेहत पीछे तो नहीं छूट रही? क्या किसान को सही जानकारी और सुरक्षित विकल्प मिल रहे हैं? और क्या बाजार तक पहुंचने वाले खाने वाले चीजों की जांच हो रही है?
फिल्म की रिलीज से पहले अभिनेत्री काजल अग्रवाल और अभिनेता श्रेयस तलपडे ने दर्शकों से फिल्म देखने की अपील की. काजल अग्रवाल ने कहा कि 'द इंडिया स्टोरी' केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक ऐसे मुद्दे पर चर्चा शुरू करने की कोशिश है, जो हर भारतीय परिवार से जुड़ा हुआ है. उन्होंने कहा कि ये फिल्म लोगों को अपने खाने और उससे जुड़े विकल्पों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करेगी. श्रेयस तलपडे ने कहा कि फिल्म ऐसे विषय को सामने लाती है, जिससे लाखों लोग प्रभावित होते हैं, लेकिन उस पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती. उन्होंने उम्मीद जताई कि दर्शक फिल्म देखने के बाद इस विषय पर अपने घरों और समाज में भी बातचीत करेंगे.
पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने प्राकृतिक खेती, जैविक खेती और रसायनों के कम इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं. किसानों को प्रशिक्षण देने और सुरक्षित खेती को बढ़ावा देने की भी बात कही जाती रही है. इसके बावजूद समय-समय पर अलग-अलग राज्यों से बैन कीटनाशकों के इस्तेमाल, नकली कृषि रसायनों की बिक्री और फलों-सब्जियों में अधिक कीटनाशक मिलने जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि नियमों के पालन और निगरानी की व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है.
खेती में इस्तेमाल होने वाले पेस्टिसाइड का मुद्दा केवल किसानों तक सीमित नहीं है. इससे जुड़ा हर फैसला सीधे आम लोगों की थाली और सेहत पर असर डाल सकता है, इसलिए विशेषज्ञ लगातार सलाह देते हैं कि किसानों को वैज्ञानिक तरीके से कीटनाशकों के उपयोग की जानकारी दी जाए, सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराए जाएं और बाजार में बिकने वाले खाने की चीजों की नियमित जांच की जाए.
ज़ी स्टूडियोज़ और एमआईजी प्रोडक्शन एंड स्टूडियोज़ के बैनर तले बनी 'द इंडिया स्टोरी' का निर्देशन चेट्टन डीके ने किया है, जबकि इसकी कहानी और निर्माण सागर बी. शिंदे ने किया है. फिल्म आज 24 जुलाई 2026 को हिंदी, तेलुगु और तमिल भाषाओं में दुनियाभर के सिनेमाघरों में रिलीज हो रही है. फिल्म यह दावा नहीं करती कि वह सभी समस्याओं का समाधान है, लेकिन यह जरूर कोशिश करती है कि खेती, भोजन और स्वास्थ्य से जुड़े एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर देशभर में नई चर्चा शुरू हो. आखिर सुरक्षित भोजन और सुरक्षित खेती का सवाल केवल किसानों का नहीं, बल्कि हर भारतीय का है.