
कभी धान, गेहूं, मक्का, गन्ना और सब्जियों की पारंपरिक खेती के लिए पहचाने जाने वाले उत्तराखंड के देहरादून जिले में अब किसान जड़ी-बूटियों की खेती से नई सफलता की कहानी लिख रहे हैं. बढ़ती खेती लागत, कम होता मुनाफा, जंगली जानवरों का खतरा और खेती से हो रहे कम लाभ के बीच किसानों ने फसल विविधीकरण की राह अपनाई और आज यह फैसला उनकी आमदनी बढ़ाने का बड़ा जरिया बन गया है.
देहरादून में फिलहाल 68 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अलग-अलग प्रकार की हर्बल फसलों की खेती की जा रही है. किसान डिल, सेज, माजोरम, थाइम, पार्सले, बेसिल, ओरिगैनो, धनिया, सेलरी, पुदीना और चेर्विल जैसी जड़ी-बूटियां उगा रहे हैं. कुछ साल पहले तक ये फसलें अधिकांश किसानों के लिए नई थीं, लेकिन अब इनसे अच्छी कमाई हो रही है.
हर्बल खेती के विस्तार में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) देहरादून और फ्लेक्स फूड्स प्राइवेट लिमिटेड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. साल 2006 में शुरू किए गए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग मॉडल के तहत कंपनी किसानों को क्वालिटी से भरे बीज और रोपण सामग्री उपलब्ध कराती है और उनकी उपज को तय व्यवस्था के तहत खरीदने की गारंटी देती है.
वहीं कृषि विज्ञान केंद्र किसानों को ट्रेनिंग, तकनीकी सलाह और वैज्ञानिक खेती की जानकारी देता है. बाजार की गारंटी मिलने से किसानों का जोखिम कम हुआ और वे नई फसलों को अपनाने के लिए आगे आए.
हर्बल खेती ने सिर्फ किसानों की आय नहीं बढ़ाई, बल्कि गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं. खेती, कटाई, छंटाई और क्वालिटी मैनेजमेंट जैसे कार्यों में बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाओं और युवाओं को काम मिल रहा है.
पिछले एक दशक में किसानों ने जड़ी-बूटी उत्पादन, क्वालिटी बनाए रखने और मार्केटिंग से जुड़ी विशेष कौशल भी हासिल की है. इसका असर ग्रामीण जीवन स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है. बेहतर आय से कई परिवारों ने अपने घरों और जीवनशैली में सुधार किया है.
आज जिले के 105 से अधिक युवा किसान भी सीमित स्तर पर व्यावसायिक हर्बल खेती कर रहे हैं.
साल 2020-21 के दौरान 68 हेक्टेयर क्षेत्र में की गई हर्बल खेती से 2,330 मीट्रिक टन उत्पादन हासिल हुआ. इससे किसानों को कुल 2.43 करोड़ रुपये से अधिक की आय हुई.
पार्सले की खेती से सबसे अधिक कुल आय मिली, जबकि थाइम और माजोरम जैसी फसलें प्रति इकाई क्षेत्र में सबसे ज्यादा लाभ देने वाली साबित हुईं. इन जड़ी-बूटियों का उपयोग प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट, फ्लेवरिंग और फूड गार्निशिंग के लिए किया जाता है और इनकी मांग देश के साथ-साथ विदेशों में भी है.
विशेषज्ञों के मुताबिक हर्बल खेती में पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक तकनीकी जानकारी और श्रम की जरूरत होती है. सही दूरी पर पौधे लगाना, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर सिंचाई और विशेष देखभाल उत्पादन की क्वालिटी तय करते हैं.
इस खेती की कुल लागत का 75 प्रतिशत से अधिक हिस्सा श्रम पर खर्च होता है. यही वजह है कि यह खेती ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन का बड़ा माध्यम बन रही है.
विशेषज्ञों का मानना है कि हर्बल खेती का बाजार अभी सीमित और विशेष प्रकार का है. ऐसे में किसानों को मजबूत मार्केटिंग व्यवस्था, प्रोसेसिंग यूनिटों और भंडारण सुविधाओं की जरूरत है.
यदि गांव स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट लगाए जाएं तो किसान अपनी उपज का स्थानीय स्तर पर दाम बढ़ा सकेंगे. इससे छोटे उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा और ग्रामीण युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे.
देहरादून का यह अनुभव दिखाता है कि वैज्ञानिक तकनीक, संस्थाओं के सहयोग और बाजार की गारंटी मिलने पर किसान पारंपरिक खेती के साथ नई फसलों को अपनाकर बेहतर आय हासिल कर सकते हैं. जड़ी-बूटी की खेती आज जिले में कृषि विविधीकरण, ग्रामीण रोजगार और किसानों की बढ़ती आय का सफल उदाहरण बन चुकी है.