
रासायनिक उर्वरकों के बढ़ते खर्च और मिट्टी की घटती उर्वरता के बीच छत्तीसगढ़ के किसान अब प्राकृतिक खेती की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं.हरी खाद के रूप में ढैंचा की खेती इस बदलाव का प्रमुख माध्यम बनकर उभर रही है. ढैंचा न केवल मिट्टी की सेहत सुधारता है, बल्कि खेती की लागत कम करने और लंबे समय तक उत्पादन क्षमता बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाता है.
महासमुंद जिले के बसना विकासखंड के ग्राम बड़ेसाजापाली के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने अपने 0.80 हेक्टेयर खेत में ढैंचा की फसल लगाकर प्राकृतिक खेती की दिशा में एक प्रेरक पहल की है. लगभग 30 दिन की हो चुकी इस फसल को जल्द ही खेत में पलटकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जाएगा. इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ और प्राकृतिक नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ेगी, जिससे अगली फसल को बेहतर पोषण मिलेगा.
ढैंचा एक दलहनी हरी खाद वाली फसल है, जिसे बहुत कम समय में तैयार किया जा सकता है. इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी जड़ों में मौजूद जीवाणु वातावरण से नाइट्रोजन लेकर मिट्टी में जमा करते हैं. जब फसल को फूल आने से पहले खेत में पलट दिया जाता है, तो यह प्राकृतिक खाद में बदल जाती है और मिट्टी को भरपूर पोषण देती है.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार ढैंचा हरी खाद के रूप में सबसे प्रभावी फसलों में शामिल है और प्राकृतिक खेती का मजबूत आधार माना जाता है.
हिमांशु बंजारे का कहना है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से खेती की लागत में कमी आती है और मिट्टी की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है.उनके अनुसार ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलें खेतों को प्राकृतिक रूप से पोषक तत्व उपलब्ध कराती हैं, जिससे उत्पादन बेहतर होने के साथ खेती अधिक लाभकारी बनती है. उन्होंने अन्य किसानों से भी हरी खाद अपनाने की अपील की है.
कृषि विभाग के उप संचालक एफ.आर. कश्यप ने बताया कि ढैंचा, सन, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी दलहनी फसलें हरी खाद के लिए बेहद उपयोगी हैं. इनका उपयोग करने से मिट्टी की संरचना सुधरती है, जलधारण क्षमता बढ़ती है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होती है. विभाग किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण देकर प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दे रहा है.
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार प्राकृतिक, जैविक और कम लागत वाली खेती को बढ़ावा देने के लिए लगातार काम कर रही है. किसानों को प्रशिक्षण, जागरूकता और तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है, ताकि वे टिकाऊ कृषि पद्धतियां अपनाकर अपनी आय बढ़ा सकें.
महासमुंद के हिमांशु बंजारे की पहल यह साबित करती है कि यदि किसान ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलों को खेती का हिस्सा बनाएं, तो वे मिट्टी की सेहत सुधारने, रासायनिक खाद का खर्च घटाने और लंबे समय तक बेहतर उत्पादन हासिल करने में सफल हो सकते हैं.बदलते जलवायु परिदृश्य में ढैंचा केवल एक फसल नहीं, बल्कि टिकाऊ और आत्मनिर्भर खेती की मजबूत नींव बनता जा रहा है.