
देश में उर्वरक (खाद) पर मिलने वाली सरकारी सब्सिडी को लेकर अब नई बहस शुरू हो गई है. विशेष उर्वरक (स्पेशलिटी फर्टिलाइजर) उद्योग से जुड़े संगठनों ने केंद्र सरकार से कहा है कि मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था में कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है. उनका कहना है कि कई जगहों पर किसान जब सब्सिडी वाली खाद खरीदने जाते हैं, तो उन्हें जरूरत न होने के बावजूद दूसरी खाद या पोषक तत्व भी खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है. इस तरह की जबरन बिक्री को 'टैगिंग' कहा जाता है. उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान जल्द निकाला जाना चाहिए, ताकि किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े.
1 और 2 जुलाई 2026 को गुजरात के गांधीनगर में SOMS Summit 2026 का आयोजन किया गया. इस सम्मेलन में घुलनशील उर्वरक (Soluble Fertilizers), जैव उर्वरक (Bio-fertilizers), जैविक खाद (Organic Fertilizers), सूक्ष्म पोषक तत्व (Micronutrients) और बायोस्टिमुलेंट्स (Biostimulants) से जुड़े उद्योगों के प्रतिनिधि, वैज्ञानिक, किसान नेता और विशेषज्ञ शामिल हुए.
बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि भारत को विशेष उर्वरकों के उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना होगा. साथ ही नई तकनीकों को बढ़ावा देने, आयात पर निर्भरता कम करने और पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा देने पर भी चर्चा हुई.
बैठक में बताया गया कि देश के कई हिस्सों में किसान सब्सिडी वाली खाद खरीदने जाते हैं, लेकिन दुकानदार उन्हें दूसरी खाद भी खरीदने के लिए मजबूर करते हैं. अगर किसान ऐसा नहीं करते तो कई बार उन्हें सब्सिडी वाली खाद नहीं दी जाती.
उदाहरण के तौर पर राजस्थान में किसानों ने शिकायत की कि यदि वे 10 बोरी डीएपी (DAP) खरीदना चाहते हैं, तो उन्हें 10 बोतल नैनो उर्वरक भी खरीदने के लिए कहा जाता है. इससे किसानों पर करीब 2,400 रुपये का अतिरिक्त खर्च आ जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि किसान केवल वही खाद खरीदना चाहते हैं जिसकी उनकी फसल को जरूरत होती है, लेकिन इस तरह की जबरदस्ती उनके लिए बड़ी समस्या बन रही है.
सम्मेलन में विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि सरकार सब्सिडी का पैसा सीधे किसानों के खाते में भेजने की व्यवस्था पर विचार करे. उनका कहना है कि यदि किसान को सीधे सहायता मिलेगी, तो वह अपनी जरूरत के अनुसार खाद खरीद सकेगा और दुकानदारों की मनमानी भी कम होगी.
इसके अलावा यह भी मांग की गई कि आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) में बदलाव किया जाए. उद्योग संगठनों का कहना है कि जो दुकानदार किसानों को जबरन दूसरी खाद खरीदने के लिए मजबूर करते हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. इसके लिए उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत भी कार्रवाई का सुझाव दिया गया.
सम्मेलन में उत्तर प्रदेश सरकार की उस कार्रवाई की सराहना की गई, जिसमें खाद की जबरन बिक्री यानी "टैगिंग" के खिलाफ सख्त कदम उठाए गए हैं. साथ ही केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा राज्यों को इस गलत प्रथा को रोकने के निर्देश देने का भी स्वागत किया गया.
किसान नेताओं ने कहा कि कई बार किसानों को ऐसी खाद खरीदनी पड़ती है जिसकी उन्हें जरूरत ही नहीं होती. इससे उनका पैसा भी खर्च होता है और कई बार उन्हें कम गुणवत्ता वाले उत्पाद भी खरीदने पड़ते हैं. उन्होंने किसानों की शिकायतें सुनने के लिए एक स्वतंत्र अधिकारी (ओम्बड्समैन) नियुक्त करने की भी मांग की.
सम्मेलन में बताया गया कि भारत का स्पेशलिटी फर्टिलाइजर बाजार लगभग 1 अरब डॉलर (करीब 8,500 करोड़ रुपये) का है. इसमें पानी में घुलने वाली खाद का बाजार लगभग 3,700 करोड़ रुपये, जैव उर्वरकों का 2,350 करोड़ रुपये और सूक्ष्म पोषक तत्वों का बाजार 2,142 करोड़ रुपये का है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस क्षेत्र को सही नीतियां और बेहतर व्यवस्था मिले, तो इससे किसानों की आय बढ़ सकती है, खेती अधिक टिकाऊ बन सकती है और देश की खाद्यान्न सुरक्षा भी मजबूत होगी.
सम्मेलन के साथ दो दिन का SOMS B2B Expo 2026 भी आयोजित किया गया. इसमें 70 से अधिक कंपनियों ने विशेष उर्वरकों से जुड़ी नई तकनीकों, आधुनिक उत्पादों और खेती के नए समाधान प्रदर्शित किए. इस प्रदर्शनी में 2,000 से अधिक लोग शामिल हुए, जिनमें किसान, वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ, उद्योग से जुड़े लोग और नए उद्यमी भी मौजूद रहे.
सम्मेलन में शामिल विशेषज्ञों और किसान संगठनों का मानना है कि यदि सरकार उर्वरक वितरण व्यवस्था में सुधार करती है और किसानों को जरूरत के अनुसार ही खाद खरीदने की आजादी मिलती है, तो खेती की लागत कम होगी और किसानों को आर्थिक राहत मिलेगी. साथ ही देश में विशेष उर्वरकों का उत्पादन भी बढ़ेगा और भारत कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक और कदम आगे बढ़ सकेगा.
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