
लखनऊ के 'सेंट्रल सॉइल सैलिनिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट' (CSSRI) के वैज्ञानिकों ने सालों की कड़ी मेहनत के बाद एक कमाल की कामयाबी हासिल की है. हमारे किसान लंबे समय से पराली और फसल के बचे-कुचे हिस्सों जैसे धान, मक्का और गन्ने के अवशेष को ठिकाने लगाने की समस्या से जूझ रहे है. इस परेशानी को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक जैविक यानि बायोलॉजिकल लिक्विड तैयार किया है, जिसका नाम 'हेलो केयर' (Halo Care) रखा गया है. यह लिक्विड फसल के कचरे को बहुत ही कम समय में बेहतरीन खाद में बदल देता है. इस तकनीक के आने से अब किसानों को अपनी खेतों में बची हुई पराली को जलाने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ेगी.
यह अनोखा लिक्विड दरअसल एक खास फंगस का मिश्रण है, जिसे वैज्ञानिकों ने करीब तीन साल की लंबी रिसर्च और तजुर्बे के बाद तैयार किया है. आम तौर पर खेतों में बची हुई पराली या डंठल को सड़कर प्राकृतिक खाद बनने में कम से कम दो से तीन महीने का लंबा वक्त लग जाता है. संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक डॉ. संजय अरोड़ा का कहना है कि 'हेलो केयर' का इस्तेमाल करने पर यही काम सिर्फ तीन हफ्ते के भीतर बेहद आसानी से गला कर खाद बना देता है. लैब और खेतों में किए गए ट्रायल से यह साबित हुआ है कि यह लिक्विड पुराने और पारंपरिक तरीकों के मुकाबले 20 प्रतिशत ज़्यादा असरदार है और यह कचरे को 70 प्रतिशत तक तेजी से गलाकर मिट्टी में मिला देता है.
इस बेहतरीन लिक्विड की सबसे बड़ी खूबी इसका बेहद किफायती दाम और आसान इस्तेमाल है. इस पूरे प्रोडक्ट को एक ही बोतल में बंद किया गया है, ताकि किसानों को अलग-अलग चीजें खरीदने की झंझट न पालनी पड़े. इसकी सिर्फ 1 लीटर मात्रा की कीमत मात्र 150 रुपये है. इसे इस्तेमाल करने के लिए 1 लीटर लिक्विड को 200 लीटर साफ पानी में अच्छे से घोलना होता है, और फिर इस घोल को एक एकड़ खेत में पड़े फसल के अवशेषों पर छिड़क दिया जाता है. इस तरह पूरे एक एकड़ खेत की पराली को खाद में तब्दील करने का कुल खर्च सिर्फ 150 से 200 रुपये के बीच आता है, जो कि किसी भी मामूली मशीनरी या मजदूर के खर्च से कहीं गुना सस्ता है.
वैज्ञानिकों का दावा है कि इस घोल के छिड़काव के बाद जो जैविक खाद बनकर तैयार होती है, वो जमीन की सेहत के लिए बेहद फायदे मंद है. यह जमीन में कार्बन की मात्रा को बढ़ाती है और मिट्टी की उपजाऊ ताकत को कई गुना मजबूत करती है. इस जैविक खाद के लगातार इस्तेमाल से खेतों की पैदावार में करीब 12 से 15 प्रतिशत की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है. सबसे अच्छी बात यह है कि यह प्रोडक्ट सिर्फ धान की पराली के लिए ही नहीं, बल्कि गेहूं की नरई और गन्ने के पत्तों पर भी बराबर रूप से असरदार साबित हुआ है. यानी एक ही दवा से सभी तरह की फसलों के कचरे का पक्का समाधान मुमकिन है.
यह तकनीक पर्यावरण को बचाने की दिशा में एक लाभकारी कदम है. हर साल पराली जलाने की वजह से जो जहरीला धुआं और वायु प्रदूषण फैलता है, जिससे आम लोगों का दम घुटने लगता है, इस लिक्विड के आने से उस पर पूरी तरह काबू पाया जा सकेगा. संस्थान के मुख्य वैज्ञानिक डॉ.संजय अरोड़ा का कहना है कि इस प्रोडक्ट को पेटेंट कराने की प्रक्रिया जारी है. लेकिन किसानों के बड़े फायदे को देखते हुए, इसे जल्द ही सरकारी कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए सीधे किसानों तक पहुंचाने का इंतजाम किया जा रहा है. सरकार की कोशिश है कि यह सस्ती और लाजवाब तकनीक हर छोटे-बड़े किसान के हाथों तक पहुंचे ताकि प्रदूषण भी खत्म हो और किसानों की आमदनी भी बढ़े.