कमजोर प्री‑मॉनसून: आम की फसल चौपट, ला नीना के डर से धान छोड़ बाजरे की खेती में लगे किसान

कमजोर प्री‑मॉनसून: आम की फसल चौपट, ला नीना के डर से धान छोड़ बाजरे की खेती में लगे किसान

कमजोर प्री‑मॉनसून बारिश से कर्नाटक सहित दक्षिण भारत में आम की फसल को भारी नुकसान हुआ है. ला नीना और कमजोर मॉनसून की आशंका के चलते किसान धान छोड़कर कम पानी वाली फसलों की ओर रुख करने पर मजबूर हैं.

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क‍िसान तक
  • New Delhi,
  • May 11, 2026,
  • Updated May 11, 2026, 4:58 PM IST

खेती के लिहाज से प्री‑मॉनसून बारिश की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है, खासकर दक्षिण भारत के राज्यों में, जहां आम की बागवानी काफी हद तक इसी बारिश पर निर्भर रहती है. इस बार कर्नाटक सहित दक्षिण के कई राज्यों में प्री‑मॉनसून की बारिश कमजोर पड़ गई, जिससे आम की फसल को भारी नुकसान झेलना पड़ा है.

कर्नाटक के किसानों का कहना है कि पिछले सीजन की तुलना में इस बार आम की पैदावार महज दसवां हिस्सा ही रह गई है. समय पर नमी न मिलने के कारण बड़ी संख्या में आम के फल सूख गए और गिर गए. किसानों के अनुसार, प्री‑मॉनसून की नाकामी ने पूरे सीजन की मेहनत पर पानी फेर दिया.

ला नीना से कमजोर मॉनसून

इसी बीच मौसम को लेकर एक और बड़ी चिंता सामने आ रही है—ला नीना और संभावित कमजोर मॉनसून की. दक्षिण भारत के किसानों को डर है कि अगर आने वाले महीनों में बारिश उम्मीद से कम रही, तो धान जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलों की खेती मुश्किल हो जाएगी.

इन आशंकाओं के चलते कई किसान अब धान की खेती छोड़कर कम पानी वाली फसलों, खासकर बाजरा, की ओर रुख करने की योजना बना रहे हैं. हालांकि किसानों का कहना है कि बाजरे की खेती भी पूरी तरह आसान नहीं है. भले ही इसमें पानी कम लगे, लेकिन कटाई और मजदूरी की लागत काफी अधिक होती है, जिससे मुनाफा सीमित रह जाता है.

आईएमडी का पूर्वानुमान

पिछले सप्ताह भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपने ताजा पूर्वानुमान में बताया कि इस बार देश में मॉनसून की बारिश सामान्य से कम रह सकती है और इसका औसत लगभग 92 प्रतिशत रहने का अनुमान है. भारत में सालाना बारिश का लगभग तीन‑चौथाई हिस्सा मॉनसून के चार महीनों में होता है. मॉनसून कमजोर रहने की स्थिति में जलाशयों, भूजल स्तर और पनबिजली उत्पादन पर भी असर पड़ता है.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बारिश कम होती है, तो किसानों को कम अवधि में पकने वाली और कम पानी की जरूरत वाली फसलों को अपनाना होगा. इसके अलावा मुख्य फसल बोने से पहले सनई या कुल्थी जैसी हरी खाद फसलें बोने की सलाह दी जा रही है, ताकि मिट्टी की नमी और पोषक तत्वों की क्षमता को बेहतर बनाया जा सके.

कम पानी वाली फसलों की खेती

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने हाल के वर्षों में चावल, मक्का, रागी और दालों की ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन देने में सक्षम हैं.

मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर अल नीनो की घटनाएं भारतीय उपमहाद्वीप में मॉनसून को कमजोर करती हैं, लेकिन इसका असर हमेशा एक‑सा नहीं होता. पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मीटियोरोलॉजी के पूर्व वैज्ञानिक पार्थसारथी मुखोपाध्याय के मुताबिक, 1997 में अल नीनो की बेहद मजबूत स्थिति के बावजूद भारत में मॉनसून सामान्य रहा था.

उन्होंने कहा कि कभी‑कभी इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) अल नीनो के प्रभाव को संतुलित कर देता है, लेकिन IOD का सटीक पूर्वानुमान लगाना ज्यादा कठिन होता है. इन तमाम परिस्थितियों के बीच दक्षिण भारत के कई राज्यों में किसान आने वाले मॉनसून और मौसम के मिजाज को लेकर गहरी चिंता में हैं.

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