
केंद्र सरकार जल्द ही भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले खरपतवार नाशकों में से एक पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर देशभर में बैन लगा सकती है. यह फैसला उस समय सामने आया है, जब विशेषज्ञों की एक समिति ने इस रसायन से जुड़े गंभीर स्वास्थ्य खतरों पर चिंता जताई है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पैराक्वाट डाइक्लोराइड का संबंध जानलेवा जहर, किडनी फेल होने, फेफड़ों की गंभीर बीमारी जैसी समस्याओं से जुड़ा पाया गया है. अगर यह बैन लागू होता है, तो इसका असर देश के बड़े कृषि रसायन बाजार पर पड़ सकता है, क्योंकि इस रसायन के 1,500 से ज्यादा लाइसेंस धारक मौजूद हैं. यानी यह फैसला किसानों और कृषि रसायन उद्योग दोनों के लिए बड़ा बदलाव साबित हो सकता है.
सूत्रों के मुताबिक, डॉक्टरों और कृषि वैज्ञानिकों की एक समिति ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले खतरनाक असर का अध्ययन किया. इसके बाद समिति ने एकमत से इस रसायन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है. समिति का मानना है कि यह रसायन लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. इसी वजह से तेलंगाना और ओडिशा जैसे राज्यों ने पहले ही इस पर अस्थायी रोक लगा दी है और अब केंद्र सरकार से स्थायी प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं.
अगर यह प्रतिबंध लागू होता है, तो खेती में खरपतवार नियंत्रण के तरीकों में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है. खासकर अनाज, बागान और बागवानी फसलों की खेती करने वाले किसानों पर इसका असर पड़ेगा. साथ ही रासायनिक खरपतवार नाशक पर निर्भर किसानों की खेती की लागत भी बढ़ सकती है.
पैराक्वाट का इस्तेमाल भारत में चाय, रबड़, कॉफी, कपास, धान, गेहूं, मक्का, आलू, अंगूर और सेब जैसी कई फसलों में खरपतवार को नष्ट करने के लिए किया जाता है. इसके अलावा नहरों, तालाबों और जलमार्गों में उगने वाले खरपतवारों को हटाने में भी इसका उपयोग होता है. कम कीमत और तेजी से असर करने की वजह से यह भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले खरपतवार नाशकों में शामिल हो गया है.
हालांकि, अब सरकार इसे लेकर अपना पुराना रुख बदल सकती है. दरअसल, दिसंबर 2015 में कृषि मंत्रालय की पंजीकरण समिति ने कुछ सुरक्षा नियमों के साथ इसके इस्तेमाल की अनुमति जारी रखी थी. उस समय बेहतर पैकेजिंग, चेतावनी लेबल और डॉक्टरों को विषाक्तता (पॉइजनिंग) के मामलों से निपटने की ट्रेनिंग देने जैसे कदम सुझाए गए थे. यह फैसला अनुपम वर्मा समिति की सिफारिशों के आधार पर लिया गया था, जिसने उन 66 कीटनाशकों की समीक्षा की थी जिन्हें कई देशों में प्रतिबंधित या सीमित किया जा चुका था. इसके बाद सरकार ने पैराक्वाट डाइक्लोराइड की सुरक्षा, असर और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की दोबारा जांच के लिए एक नई विशेषज्ञ समिति भी बनाई.
आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ने के बावजूद किसानों के बीच पैराक्वाट का इस्तेमाल लगातार जारी है. सूत्रों के मुताबिक, इसका आयात 2019-20 में 8,598 टन था, जो बढ़कर 2022-23 में 20,786 टन तक पहुंच गया. वहीं, घरेलू बिक्री 2019-20 में 1.13 लाख टन थी, जो 2020-21 में घटकर 74,490 टन रह गई थी. लेकिन बाद में इसकी मांग फिर बढ़ी और 2023-24 में बिक्री करीब 1.05 लाख टन तक पहुंच गई.
इसी बीच तेलंगाना सरकार ने 1 अप्रैल से 60 दिनों के लिए पैराक्वाट की बिक्री, वितरण और इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. मौजूदा नियमों के अनुसार राज्य सरकारें अधिकतम 60 दिनों तक ही ऐसा प्रतिबंध लगा सकती हैं. तेलंगाना ने केंद्र सरकार से इसे पूरे देश में स्थायी रूप से बैन करने की मांग की है. इससे पहले ओडिशा ने भी 2023 में ऐसा ही कदम उठाया था. वहीं, केरल सरकार ने भी इस पर लंबे समय तक रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन अदालत ने यह कहते हुए उसे खारिज कर दिया कि राज्य सरकारें किसी कीटनाशक पर अनिश्चितकालीन प्रतिबंध नहीं लगा सकतीं.
फरवरी 2026 में नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में प्रकाशित एक अध्ययन में पैराक्वाट को बेहद खतरनाक रसायन बताया गया है. शोध के अनुसार, अगर यह शरीर में निगलने, सांस के जरिए या त्वचा के संपर्क से पहुंच जाए, तो यह गंभीर बीमारी और मौत तक का कारण बन सकता है. यह अध्ययन आंध्र मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों ने किया था. शोध में कहा गया है कि भारत में पैराक्वाट के जानबूझकर या गलती से संपर्क में आने के बाद मौतों की संख्या चिंता का बड़ा कारण बनती जा रही है. विशेषज्ञों के मुताबिक, पैराक्वाट से यकृत और किडनी फेल होना, फेफड़ों की गंभीर बीमारी जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. कई मामलों में इसकी विषाक्तता जानलेवा साबित होती है.
हालांकि, कृषि वैज्ञानिक और अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि अगर पैराक्वाट पर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है. खासकर बागान फसलों और उन इलाकों में जहां मजदूरों की कमी है और खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायनों पर ज्यादा निर्भरता रहती है. अध्ययन में बताया गया है कि पैराक्वाट के विकल्प अपनाने पर खर्च 2 से 10 गुना तक बढ़ सकता है. वहीं बिना रसायन वाले तरीकों की लागत मौजूदा तरीके से 10 से 100 गुना तक ज्यादा हो सकती है. इसके बावजूद शोध में कहा गया है कि इस रसायन से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान और मौतों का खतरा किसी भी आर्थिक बचत से कहीं ज्यादा बड़ा है.