
भारत खेती-किसानी वाला देश है और यहां किसानों की अच्छी फसल के लिए खाद बहुत जरूरी मानी जाती है. लेकिन आज देश एक बड़े खाद संकट का सामना कर रहा है. भारत अभी भी कई जरूरी खादों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है. अंतरराष्ट्रीय हालात खराब होने और कई देशों में सप्लाई रुकने से अब भारत में खाद की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो रही हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट भारत के लिए “मेक इन इंडिया” को मजबूत करने का बड़ा मौका भी बन सकता है.
भारत पोटाश, फॉस्फेट और कई दूसरी खादों के लिए बड़े पैमाने पर आयात करता है. पोटाश की लगभग पूरी जरूरत विदेशों से पूरी होती है. वहीं फॉस्फेट से जुड़ी कच्ची सामग्री भी दूसरे देशों से आती है. रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन की निर्यात रोक जैसी घटनाओं ने खाद की सप्लाई को प्रभावित किया है. इसका असर सीधे किसानों और सरकार दोनों पर पड़ा है. खाद महंगी हो रही है और सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में किसान लंबे समय से यूरिया और डीएपी जैसी खादों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो रही है और फसलों को संतुलित पोषण नहीं मिल पा रहा. अब माइक्रोन्यूट्रिएंट और विशेष खादों की जरूरत बढ़ रही है. इनमें जिंक, आयरन और बोरॉन जैसे तत्व होते हैं, जो कम मात्रा में इस्तेमाल होकर भी फसलों को अच्छा फायदा देते हैं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत की कई कंपनियां अब नई तकनीक वाली खाद तैयार कर रही हैं. पानी में घुलने वाली हाई डेंसिटी एनपीके खाद कम मात्रा में इस्तेमाल होकर भी ज्यादा असर दिखाती है. इससे किसानों का खर्च कम हो सकता है और फसल उत्पादन बढ़ सकता है. चीन द्वारा निर्यात कम करने के बाद भारतीय कंपनियों के लिए यह बड़ा अवसर माना जा रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार घरेलू खाद उद्योग को बढ़ावा दे और नियम आसान बनाए, तो भारत खाद उत्पादन में आत्मनिर्भर बन सकता है. इसके साथ ही भारत दूसरे देशों को भी खाद निर्यात कर सकता है. रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि भारत में बनने वाली खादों पर एक समान GST लागू हो और उत्पादन को बढ़ाने के लिए उद्योगों को प्रोत्साहन दिया जाए.
खाद संकट ने यह साफ कर दिया है कि भारत को अब सिर्फ आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. किसानों को संतुलित खाद उपयोग के बारे में जागरूक करना और देश में ही ज्यादा खाद उत्पादन बढ़ाना समय की जरूरत बन गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि “मेक इन इंडिया” सिर्फ नारा नहीं, बल्कि आने वाले समय में भारत की खेती और खाद्य सुरक्षा की मजबूत नींव बन सकता है.
ये भी पढ़ें:
Kahani Karwan Ki: स्वस्थ मिट्टी और संतुलित उर्वरक से बदली खेती की तस्वीर, 9 जिलों के किसानों ने साझा किए अनुभव
Government Scheme: उत्पादन की लागत बढ़ा देती है पशुओं की बीमारी, ऐसे उठाएं सरकारी मदद का फायदा