
भारत में हर्बिसाइड टॉलरेंट Bt यानी HTBt कपास की व्यावसायिक खेती को अभी मंजूरी नहीं मिली है. इसके बावजूद देश के कई हिस्सों में इसकी खेती बड़े स्तर पर होने का दावा किया गया है. बीज उद्योग से जुड़े संगठन फेडरेशन ऑफ सीड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया (FSII) और नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (NSAI) ने सरकार से HTBt कपास को जल्द मंजूरी देने की मांग की है. संगठनों का कहना है कि इसकी अवैध खेती के कारण करीब 1,500 करोड़ रुपये का अनौपचारिक बीज बाजार तैयार हो गया है.
FSII के चेयरमैन अजय राणा ने बताया कि खरीफ 2025-26 में देश में करीब 65 से 72 लाख एकड़ क्षेत्र में अवैध HTBt कपास की खेती होने का अनुमान है. यह देश के कुल कपास क्षेत्र का करीब 24 से 30 फीसदी हिस्सा बताया गया है. उनके मुताबिक, इस समय करीब 1.25 करोड़ पैकेट HTBt बीज बेचे जा रहे हैं. इनकी अनुमानित कीमत करीब 1,500 करोड़ रुपये है. वहीं, देश के कुल कपास बीज बाजार का आकार करीब 5.5 करोड़ पैकेट और करीब 6,000 करोड़ रुपये बताया गया है.
FSII और NSAI का कहना है कि भारत में कपास का उत्पादन बढ़ाने के लिए किसानों को नई तकनीक और ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्में उपलब्ध कराना जरूरी है. दोनों संगठनों ने सरकार से HTBt कपास की मंजूरी की प्रक्रिया तेज करने की मांग की है. अजय राणा के मुताबिक, HTBt कपास की मंजूरी के लिए महाइको की ओर से 2024 में आवेदन किया जा चुका है. उनका कहना है कि नई तकनीक उपलब्ध होने से किसानों को खरपतवार नियंत्रण में मदद मिल सकती है और कपास की खेती की लागत को कम करने का विकल्प मिल सकता है.
भारत में कपास का उत्पादन करीब 2.9 करोड़ गांठ है. एक गांठ का वजन 170 किलो होता है. बीज उद्योग संगठनों का कहना है कि प्रति एकड़ कपास की उत्पादकता में कमी आने के कारण भारत की कपास उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्रभावित हुई है और देश को कपास का आयात भी करना पड़ा है. FSII का कहना है कि भारत को फिर से कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने और कपास अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए नई तकनीक को मंजूरी देना जरूरी है.
FSII के मुताबिक, किसान अपनी इच्छा से अवैध बीज नहीं खरीद रहे हैं. संगठन का कहना है कि किसानों को अपनी जरूरत के मुताबिक तकनीक उपलब्ध नहीं होने के कारण वे अनौपचारिक बाजार का सहारा ले रहे हैं. संगठन के अनुसार, किसान इन बीजों के लिए अतिरिक्त टेक्नोलॉजी फीस भी दे रहे हैं. FSII का दावा है कि किसान खेती को चलाए रखने और फसल बीमा जैसी जरूरतों के कारण भी इस तरह के बीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं. हालांकि, यह संगठन का दावा है और HTBt कपास की अवैध खेती को लेकर सरकार की ओर से अलग आधिकारिक आंकड़ा इस रिपोर्ट में उपलब्ध नहीं है.
अध्ययन में HTBt कपास के इस्तेमाल के पीछे खेती में मजदूरों की कमी को भी एक प्रमुख वजह बताया गया है. कपास की फसल में खरपतवार हटाने के लिए हाथ से मजदूर लगाने पर करीब 12,000 से 15,000 रुपये प्रति एकड़ खर्च होने का अनुमान है. वहीं, ग्लाइफोसेट के जरिए खरपतवार नियंत्रण की लागत करीब 750 से 850 रुपये प्रति एकड़ बताई गई है. कम लागत और मजदूरों की कमी के कारण किसान खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट जैसे विकल्पों की ओर बढ़ रहे हैं.
अध्ययन के मुताबिक, देश में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल में भी बढ़ोतरी हुई है. वर्ष 2024-25 में इसका इस्तेमाल करीब 27,721 किलोलीटर था, जो 2025-26 में बढ़कर 35,642 किलोलीटर हो गया. यानी एक साल में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल में करीब 26 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. बीज उद्योग से जुड़े संगठनों ने कपास में ग्लाइफोसेट के इस्तेमाल को लेकर लेबल पर दिए गए दावों में बदलाव करने की भी मांग की है.
HTBt कपास की अवैध खेती को लेकर South Asia Biotechnology Centre यानी SABC ने FSII और NSAI के सहयोग से एक अध्ययन किया. इसमें महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और राजस्थान के 16 जिलों को शामिल किया गया. अध्ययन में किसानों से बातचीत, बीज की सप्लाई चेन का आकलन और ELISA आधारित जीन टेस्टिंग की गई. इसका उद्देश्य HTBt कपास की अवैध खेती का दायरा, इसके पीछे की वजह और इसके संभावित असर को समझना था.
अध्ययन के मुताबिक, जांच किए गए नमूनों में 98.2 फीसदी में कम से कम एक GM trait पाया गया. वहीं, 41.9 फीसदी नमूनों में चार transgenes पाए गए. इनमें Vip3A भी शामिल था, जिसे भारत में मंजूरी नहीं मिली है. अध्ययन में कहा गया कि बिना मंजूरी वाले जीन और तकनीक का इस्तेमाल कृषि और पर्यावरण के लिहाज से आगे चलकर जोखिम पैदा कर सकता है. हालांकि, इन निष्कर्षों को अध्ययन के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए.
Indian Society for Cotton Improvement और South Asia Biotechnology Centre के अध्यक्ष डॉ. सीडी मायई ने कहा कि बिना मंजूरी वाले जीन के इस्तेमाल और बिना निगरानी ग्लाइफोसेट के छिड़काव से कीट और खरपतवार में प्रतिरोध बढ़ने का खतरा हो सकता है. उनके मुताबिक, अगर ऐसे प्रतिरोधी कीट और खरपतवार बढ़ते हैं तो आने वाले समय में कपास की उत्पादकता पर असर पड़ सकता है. इसलिए तकनीक के इस्तेमाल के साथ उचित निगरानी और नियमन भी जरूरी है.
FSII ने HTBt कपास के साथ पिंक बॉलवर्म से जुड़ी तकनीक को भी नियामकीय मंजूरी देने की मांग की है. संगठन का कहना है कि कपास की उत्पादकता बढ़ाने और भारत को फिर से कपास उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए नई तकनीकों को उपलब्ध कराना जरूरी है. बीज उद्योग का कहना है कि अगर किसानों को नई तकनीक कानूनी और नियंत्रित तरीके से उपलब्ध कराई जाती है तो अनौपचारिक बीज बाजार पर उनकी निर्भरता कम हो सकती है.
कपास किसानों के सामने फिलहाल कम उत्पादकता, मजदूरों की कमी, बढ़ती लागत और कीट प्रबंधन जैसी कई चुनौतियां हैं. इसी वजह से HTBt कपास की मंजूरी का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आया है. FSII और NSAI सरकार से जल्द फैसला लेने की मांग कर रहे हैं. वहीं, HTBt कपास को मंजूरी देने से पहले इससे जुड़े पर्यावरणीय, कृषि और स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं का नियामकीय स्तर पर आकलन किया जाना जरूरी है. फिलहाल HTBt कपास की व्यावसायिक खेती को भारत में आधिकारिक मंजूरी नहीं मिली है.
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