
देश में खरीफ सीजन की तैयारियां तेज होते ही खाद कंपनियां कीमतों के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए नई व्यवस्था पर विचार कर रही हैं. बिजनेसलाइन ने उद्योग से जुड़े सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट में बताया है कि डाइ-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) और कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर के सालाना आयात कॉन्ट्रैक्ट में अब ‘फ्लोर और सीलिंग प्राइस’ का प्रावधान जोड़ा जा सकता है. इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती अनिश्चितता के असर को सीमित करना है.
खाद क्षेत्र की एक बड़ी कंपनी के सीईओ ने कहा कि वैश्विक बाजार में कीमतों की अस्थिरता अब सामान्य हो गई है, जिससे कंपनियों के लिए लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो रहा है. क्योंकि खाद के लिए कोई फ्यूचर ट्रेडिंग व्यवस्था नहीं है और बाजार सप्लायर के नियंत्रण में है, इसलिए जोखिम से बचाव के विकल्प सीमित हैं. ऐसे में फ्लोर और सीलिंग प्राइस जैसे उपाय को जरूरी माना जा रहा है.
हालांकि, कंपनियां फिलहाल नए अनुबंधों को लेकर जल्दबाजी में नहीं हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा वैश्विक कीमतों के स्तर पर यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि न्यूनतम और अधिकतम कीमत की सीमा क्या रखी जाए. इसलिए कई कंपनियां नए वित्तीय वर्ष से पहले अनुबंध नवीनीकरण को टाल रही हैं.
फ्लोर प्राइस वह न्यूनतम दर होती है, जिस पर कीमत गिरने की स्थिति में भी सप्लायर को भुगतान सुनिश्चित रहता है. वहीं, सीलिंग प्राइस वह अधिकतम सीमा होती है, जिसके ऊपर भारतीय खरीदार भुगतान नहीं करेंगे, चाहे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत कितनी भी बढ़ जाए.
इस बीच यूरिया की आपूर्ति को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है. फरवरी में जारी आखिरी टेंडर के बाद कोई नया टेंडर जारी नहीं हुआ है. सरकार रूस से आपूर्ति की उम्मीद कर रही है, लेकिन इसमें करीब 45 दिन का समय लग सकता है. वैश्विक कीमतों में तेज उछाल के चलते अब पहले की तुलना में यूरिया की खरीद काफी महंगी पड़ रही है.
अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत 800 डॉलर प्रति टन के पार पहुंच चुकी है, जबकि MOP 370-400 डॉलर प्रति टन के स्तर पर है. ये दरें पहले के मुकाबले काफी ज्यादा हैं, जिससे आयात लागत बढ़ रही है.
वहीं, सरकार का कहना है कि देश में खाद का भंडार पिछले साल की तुलना में बेहतर स्थिति में है और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ आयात रणनीति को मजबूत किया जा रहा है. हालिया आंकड़ों के मुताबिक यूरिया, DAP और कॉम्प्लेक्स खाद का स्टॉक पहले से ज्यादा है, हालांकि MOP का भंडार थोड़ा कम है. फिर भी विशेषज्ञों को चिंता है कि प्राकृतिक गैस की सीमित उपलब्धता के कारण घरेलू यूरिया उत्पादन प्रभावित हो सकता है. अगर उत्पादन में 30-40 फीसदी तक गिरावट आती है तो कुल उपलब्धता पर दबाव बढ़ सकता है और मांग-आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर बन सकता है.
पिछले खरीफ सीजन में यूरिया की मांग अनुमान से ज्यादा रही थी. इस बार भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद है, लेकिन उत्पादन और आयात दोनों में अनिश्चितता बनी हुई है. ऐसे में अगर समय पर पर्याप्त आपूर्ति नहीं हुई तो किसानों के लिए खाद की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन सकती है.