
खरीफ में यूरिया की टेंशन लगभग खत्म है क्योंकि सरकार ने समय रहते इसका स्टॉक बढ़ा लिया है. लेकिन कॉम्पलेक्स खादों ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है. वजह है इसका अधिकांश कच्चा माल बाहर से आता है. चीन ने सल्फर न्यूट्रीएंट का निर्यात फिर से बंद कर दिया है जिससे भारत की परेशानी और ज्यादा बढ़ गई है. कॉम्प्लेक्स खादों का बहुतायत कच्चा माल वेस्ट एशिया के रास्ते भारत आता है जिसकी लागत बहुत बढ़ गई है. इस वजह से इन खादों का प्रोडक्शन और इंपोर्ट ठप होने की कगार पर है. ऐसे में सवाल है कि सरकार क्या फिर से न्यूट्रीएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) बढ़ाकर खाद कंपनियों को राहत देगी और प्रोडक्शन बढ़ाएगी? इससे पहले केंद्र ने अप्रैल में खरीफ के लिए सब्सिडी बढ़ाने की घोषणा की थी जब ईरान की लड़ाई शुरू नहीं हुई थी. उसके बाद कॉम्पलेक्स खादों के दाम बहुत अधिक बढ़ गए हैं. इसे देखते हुए सरकार के अगले कदम का इंतजार है.
खाद कंपनियों का कहना है कि कच्चे माल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से एनपी (NP) और एनपीकेएस (NPKS) जैसे कॉम्पलेक्स खादों का उत्पादन महंगा हो गया है. ऐसे में अगर केंद्र सरकार खरीफ 2026 के लिए सब्सिडी में जल्द बढ़ोतरी नहीं करती है, तो आने वाले महीनों में इन खादों का घरेलू उत्पादन प्रभावित हो सकता है.
उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, हाल के दिनों में खाद कंपनियों ने सरकार के साथ कई दौर की बातचीत की है. कंपनियों का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट के कारण कॉम्पलेक्स खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के दाम (इंपोर्ट प्राइस) काफी बढ़ गए हैं, जिससे उनकी लागत बढ़ रही है. इस बढ़ती लागत को देखते हुए कंपनियों ने खादों के दाम कुछ हद तक बढ़ाए हैं, लेकिन कीमतों को बहुत ज्यादा बढ़ाना संभव नहीं है. ऐसे में अगर अगर सब्सिडी में बदलाव नहीं किया गया तो कंपनियों पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा.
खरीफ 2026 के लिए न्यूट्रिएंट बेस्ड सब्सिडी (NBS) की दरें अप्रैल में तय की गई थीं. उस समय पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट और उससे कच्चे माल की कीमतों पर पड़े असर को शामिल नहीं किया गया था. अमोनिया की कीमत, जो पहले 400 से 500 डॉलर प्रति टन के बीच थी, बढ़कर करीब 900 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है. वहीं सल्फर की कीमत भी लगभग 550 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1,000 से 1,100 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई है. इससे कॉम्पलेक्स खाद बनाने की लागत में काफी इजाफा हुआ है.
भारत में, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), NP और NPKS जैसे कॉम्प्लेक्स खाद न्यूट्रिएंट-बेस्ड सब्सिडी सिस्टम के दायरे में आते हैं. हालांकि कंपनियां खुद रिटेल कीमतें तय कर सकती हैं, लेकिन उन्हें न्यूट्रिएंट की मात्रा के आधार पर प्रति किलो पर एक तय सब्सिडी मिलती है.
अप्रैल 2026 में, केंद्रीय कैबिनेट ने NBS सिस्टम के तहत खरीफ 2025 की तुलना में खरीफ 2026 के लिए नॉन-यूरिया फर्टिलाइजर की प्रति किलो सब्सिडी दरों में 10-21 प्रतिशत की बढ़ोतरी को मंजूरी दी थी. इस फैसले से सरकारी खजाने पर लगभग 41,534 करोड़ रुपये का बोझ पड़ने की उम्मीद है, जो पिछले सीजन की तुलना में लगभग 12 प्रतिशत ज्यादा है.
हालांकि, जानकारों का कहना है कि यह बढ़ोतरी अब काफी नहीं है क्योंकि तब से कच्चे माल की कीमतें और बढ़ गई हैं. भारत में, न्यूट्रिएंट-बेस्ड सब्सिडी एक वित्त वर्ष में दो बार तय की जाती है. पहली बार खरीफ सीजन के दौरान, जो अप्रैल से सितंबर तक चलता है, और दूसरी बार रबी सीजन के लिए, जो अक्टूबर से मार्च तक होता है.
कॉम्पलेक्स खादों की तंगी के बीच एक अच्छी खबर यूरिया को लेकर है. खरीफ बुवाई के बीच यूरिया किल्लत की खबरें कम हैं क्योंकि सरकार ने इसकी तैयारी बहुत पहले कर ली थी. तैयारी का नतीजा हुआ कि देश में यूरिया का स्टॉक अच्छा-खासा है. सरकार ने अभी हाल में संसद को बताया कि भारत के पास खरीफ सीजन के लिए यूरिया का पर्याप्त स्टॉक है, जो सीजन की जरूरत से लगभग 50 प्रतिशत अधिक है.
लोकसभा में एक लिखित जवाब में, केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री जगत प्रकाश नड्डा ने कहा कि खरीफ 2026 सीजन के दौरान यूरिया का कुल स्टॉक 163.78 लाख मीट्रिक टन (LMT) है, जबकि जरूरत 109.40 LMT की है. यानी लगभग 47.9 प्रतिशत अतिरिक्त स्टॉक मौजूद है. कुल मिलाकर, यूरिया ने किसानों को राहत दी है, लेकिन कॉम्पलेक्स खादों की टेंशन किसान और सरकार दोनों को परेशान कर रही है.