
देश के कई राज्यों में इस समय मॉनसून पूरी तरह सक्रिय है. लगातार हो रही बारिश से जहां किसानों को सिंचाई की चिंता नहीं रहती, वहीं अधिक बारिश और खेतों में जलभराव गन्ने की फसल के लिए बड़ी परेशानी बन सकता है. अगर समय रहते सही देखभाल नहीं की जाए तो फसल की बढ़वार रुक सकती है, जड़ों को नुकसान पहुंच सकता है और कई तरह की बीमारियां भी लग सकती हैं. ऐसे में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को कुछ जरूरी सलाह दी है, जिन्हें अपनाकर गन्ने की फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है और बेहतर उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है.
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, मॉनसून के दौरान गन्ने के खेत में पानी जमा नहीं होने देना चाहिए. यदि लंबे समय तक खेत में पानी भरा रहता है तो पौधों की जड़ों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे जड़ें कमजोर होने लगती हैं और पौधे सूखने का खतरा बढ़ जाता है. इसलिए खेत में पहले से नालियां बनाकर रखें ताकि बारिश का पानी आसानी से बाहर निकल सके. यदि अधिक पानी भर जाए तो पंप की मदद से भी उसे निकाल देना चाहिए. जितनी जल्दी खेत सूखेगा, फसल उतनी ही सुरक्षित रहेगी.
वैज्ञानिकों का कहना है कि जैसे ही खेत इतना सूख जाए कि उसमें आसानी से चला जा सके, किसानों को तुरंत खाद डालनी चाहिए. बारिश के कारण कई पोषक तत्व बह जाते हैं, जिससे पौधों की बढ़वार प्रभावित होती है. ऐसे समय पर सही मात्रा में खाद देने से गन्ने को दोबारा तेजी से बढ़ने में मदद मिलती है और पौधे मजबूत बनते हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार, मॉनसून के मौसम में सामान्य मात्रा से करीब 20 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन का प्रयोग करना लाभदायक माना जाता है. इसके अलावा प्रति हेक्टेयर लगभग 30 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम सल्फर भी देना चाहिए. पोटाश पौधों को मजबूत बनाता है, जबकि सल्फर बारिश से प्रभावित फसल को दोबारा स्वस्थ होने में मदद करता है. वहीं, जिन खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है, वहां फास्फोरस पहले से पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहता है. इसलिए ऐसे खेतों में अलग से फास्फोरस डालने की जरूरत नहीं होती.
अगर किसान चाहते हैं कि पौधों को जल्दी पोषण मिले, तो पत्तियों पर पोषक तत्वों का घोल छिड़कना अच्छा विकल्प है. कृषि वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि 3 किलोग्राम यूरिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) के मिश्रण को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें. इससे पौधों को तुरंत पोषण मिलता है, पत्तियां हरी रहती हैं और फसल की बढ़वार बेहतर होती है.
लगातार जलभराव रहने पर गन्ने में रेड रॉट (लाल सड़न) जैसी फफूंद जनित बीमारी का खतरा काफी बढ़ जाता है. यह बीमारी धीरे-धीरे पूरी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है और उत्पादन कम कर सकती है. इससे बचाव के लिए कृषि वैज्ञानिक ट्राइकोडर्मा हार्ज़ियनम का उपयोग करने की सलाह देते हैं. इसे 15-15 दिन के अंतराल पर दो बार मिट्टी में या सिंचाई के पानी के साथ देना चाहिए. इससे फसल फफूंद जनित रोगों से सुरक्षित रहती है और पौधों का विकास भी बेहतर होता है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मॉनसून के मौसम में थोड़ी सी सावधानी किसानों को बड़े नुकसान से बचा सकती है. खेत में जलनिकासी की सही व्यवस्था, समय पर खाद का उपयोग, संतुलित पोषण और रोगों से बचाव के उपाय अपनाकर किसान अपनी गन्ने की फसल को सुरक्षित रख सकते हैं. इससे न केवल फसल स्वस्थ रहेगी बल्कि उत्पादन और किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी.
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