प्राकृतिक खेती से बदली शीला कुशवाहा की तकदीर, बीजामृत-जीवामृत से घटाई लागत और बढ़ाई आमदनी

प्राकृतिक खेती से बदली शीला कुशवाहा की तकदीर, बीजामृत-जीवामृत से घटाई लागत और बढ़ाई आमदनी

जबलपुर की महिला किसान शीला कुशवाहा ने पारंपरिक खेती से हटकर प्राकृतिक खेती को अपनाकर अपनी आय बढ़ाने की दिशा में सफलता हासिल की है. डेढ़ एकड़ में गेहूं, चना और विभिन्न सब्जियों की खेती के साथ वे बीजामृत और जीवामृत का उपयोग कर रही हैं. जैविक हाट में बेहतर कीमत मिलने से उनकी आमदनी बढ़ी है.

धर्मेंद्र सिंह
  • Jabalpur ,
  • Aug 11, 2026,
  • Updated Aug 11, 2026, 11:07 AM IST

खेती में नवाचार और प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग से किसान कम लागत में भी अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं. इसकी मिसाल जबलपुर जिले के मझौली विकासखंड के ग्राम सिंगपुर की महिला किसान शीला कुशवाहा ने पेश की है. कभी सामान्य कृषक परिवार की गृहिणी रहीं शीला कुशवाहा ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर प्राकृतिक खेती को अपनाया और आज सफल प्राकृतिक कृषक के रूप में अपनी अलग पहचान बना रही हैं.उनकी सफलता आसपास की दूसरी महिला किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है.

कृषि सखी बनने के बाद प्राकृतिक खेती से जुड़ीं

शीला कुशवाहा ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हुई हैं.करीब एक वर्ष पहले उन्होंने कृषि सखी के रूप में काम शुरू किया. इसी दौरान आत्मा परियोजना द्वारा संचालित राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन से जुड़कर उन्होंने प्राकृतिक खेती का प्रशिक्षण प्राप्त किया.प्रशिक्षण से मिले कृषि ज्ञान को उन्होंने अपने खेत में प्रयोग किया और करीब डेढ़ एकड़ पारिवारिक कृषि भूमि पर प्राकृतिक खेती की शुरुआत की.

डेढ़ एकड़ में कई फसलों का उत्पादन

वर्तमान में शीला कुशवाहा अपने खेत में गेहूं और चना के साथ-साथ आलू, प्याज, बैंगन और टमाटर जैसी विभिन्न सब्जियों का उत्पादन कर रही हैं. फसल विविधीकरण के जरिए उन्होंने खेती से होने वाली आमदनी के अवसर बढ़ाए हैं.खेत से निकलने वाली सब्जियों की स्थानीय स्तर पर अच्छी मांग है, जिससे उनकी उपज आसपास के गांवों में आसानी से बिक जाती है.

उनके पति पुरुषोत्तम लाल, जो वर्षों से पारंपरिक खेती करते आ रहे हैं, अब प्राकृतिक खेती के इस प्रयोग में उनका सहयोग कर रहे हैं. परिवार के सहयोग और कृषि संबंधी प्रशिक्षण ने शीला कुशवाहा के खेती के काम को नई दिशा दी है.

बीजामृत और जीवामृत से सुधरी मिट्टी की सेहत

शीला कुशवाहा प्राकृतिक खेती में बीजामृत और जीवामृत जैसी प्राकृतिक विधियों का उपयोग कर रही हैं.उनका कहना है कि इन विधियों के इस्तेमाल से खेती की लागत कम करने में मदद मिली है.साथ ही खेत की मिट्टी की उर्वरता में भी सुधार देखने को मिला है.

प्राकृतिक संसाधनों से तैयार इन जैविक इनपुट के उपयोग से रासायनिक लागत पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है. इससे फसल की गुणवत्ता के साथ-साथ मिट्टी की सेहत को बेहतर बनाए रखने में भी मदद मिल रही है.

जैविक हाट में मिल रही उपज की बेहतर कीमत

शीला कुशवाहा अपने खेत में उत्पादित जैविक उत्पादों को जबलपुर कृषि उपज मंडी परिसर में प्रत्येक रविवार आयोजित होने वाले साप्ताहिक जैविक हाट में भी बेच रही हैं.यहां उन्हें गांव की तुलना में अपने उत्पादों की बेहतर कीमत मिल रही है.

जैविक हाट उनके लिए केवल बिक्री का माध्यम नहीं बना है, बल्कि प्राकृतिक खेती से तैयार उत्पादों को सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का बेहतर अवसर भी मिला है.उनकी सब्जियों की मांग बढ़ने से प्राकृतिक खेती के प्रति उपभोक्ताओं का भरोसा भी मजबूत हो रहा है.

दूसरी महिला किसानों को भी दे रहीं प्रेरणा

शीला कुशवाहा की सफलता का असर अब उनके गांव की अन्य महिलाओं पर भी दिखाई देने लगा है. वे दूसरी महिला किसानों को प्राकृतिक खेती के तरीकों, जैविक इनपुट के इस्तेमाल और फसल विविधीकरण के लिए प्रेरित कर रही हैं.उनके मार्गदर्शन में कई महिलाएं प्राकृतिक खेती को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं.

कम लागत में बेहतर आय का संदेश

शीला कुशवाहा की कहानी यह बताती है कि खेती में केवल बड़े निवेश से ही आमदनी नहीं बढ़ाई जा सकती.आधुनिक कृषि ज्ञान, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, फसल विविधीकरण और बेहतर बाजार से जुड़ाव के जरिए किसान कम लागत में भी बेहतर आय हासिल कर सकते हैं.

गृहिणी से किसान और अब सफल प्राकृतिक कृषक बनने तक का शीला कुशवाहा का सफर ग्रामीण महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता की प्रेरक मिसाल है. उनकी सफलता प्राकृतिक खेती को अपनाने वाले किसानों के लिए यह संदेश देती है कि मिट्टी की सेहत, कम लागत और बेहतर बाजार—तीनों को साथ लेकर खेती को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता हैं. 

 

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