
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में खेती की पुरानी लीक से हटकर आधुनिक तकनीक और नवाचार को अपनाने वाले किसान राज कुमार साहू ने सफलता की एक नई मिसाल कायम की है. खरसिया विकासखंड के ग्राम बाम्हनपाली निवासी राज कुमार साहू के पास करीब 0.800 हेक्टेयर सिंचित भूमि है. पहले वे इसी जमीन पर परंपरागत तरीके से खेती करते थे — जैसा गांव के ज्यादातर किसान करते आए हैं.उस समय न तो सही तकनीक का इस्तेमाल होता था और न ही वैज्ञानिक प्रबंधन का, जिसकी वजह से उनकी मेहनत के मुकाबले मुनाफा काफी सीमित रहता था.
पुराने तरीके से खेती करने पर उनकी फसल का उत्पादन 60 से 80 क्विंटल के बीच ही सिमटा रहता था. इससे लगभग 2.48 लाख रुपये की बिक्री होती थी, लेकिन बीज, खाद, मजदूरी और अन्य खर्चों को घटाने के बाद अंत में उनके हाथ में मात्र 78 हजार रुपये का शुद्ध लाभ ही बचता था.यह मेहनत के हिसाब से बहुत कम था, और राज कुमार को समझ आ गया कि अगर आमदनी बढ़ानी है तो खेती के तरीके में बड़ा बदलाव लाना ही होगा.
इसी सोच के साथ राज कुमार साहू ने उद्यानिकी विभाग के विशेषज्ञों से संपर्क किया और उनके मार्गदर्शन में खेती की पूरी पद्धति को नए सिरे से गढ़ा. सबसे पहले उन्होंने जैविक खाद के संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल पर ध्यान दिया, ताकि मिट्टी की उर्वरता बनी रहे और लागत भी नियंत्रण में रहे. इसके साथ ही उन्होंने फसल प्रबंधन के आधुनिक तरीके अपनाए — जैसे सही समय पर सिंचाई, कीट-रोग नियंत्रण और उन्नत बीजों का चुनाव.
इस बदलाव को आर्थिक संबल देने का काम किया राष्ट्रीय बागवानी मिशन योजना ने.इस सरकारी योजना के तहत राज कुमार को 20 हजार रुपये का अनुदान प्राप्त हुआ, जिसने उन्हें नई तकनीक अपनाने में आर्थिक रूप से मदद की. सरकारी सहायता और वैज्ञानिक सलाह के इस मेल ने उनकी खेती की दिशा ही बदल दी.
बदलाव का असर बहुत जल्द और बहुत साफ दिखने लगा. जहां पहले उत्पादन 60-80 क्विंटल तक सिमटा रहता था, वहीं नई पद्धति अपनाने के बाद यह बढ़कर 100 से 120 क्विंटल तक जा पहुंचा. बरबटी और खीरा जैसी फसलों की मांग और बेहतर पैदावार के चलते इस बार फसल की बिक्री 3.60 लाख रुपये तक पहुंच गई.
खास बात यह रही कि उत्पादन बढ़ने के बावजूद लागत में बहुत ज्यादा इजाफा नहीं हुआ — कुल उत्पादन लागत मात्र 90 हजार रुपये रही. यानी सभी खर्चे घटाने के बाद राज कुमार साहू को 2.70 लाख रुपये का शुद्ध लाभ हुआ. यह उनके पुराने मुनाफे (78 हजार रुपये) के मुकाबले करीब साढ़े तीन गुना ज्यादा है — एक ऐसा आंकड़ा जो साफ दिखाता है कि सही सोच और सही तरीके से खेती करने पर कितना बड़ा फर्क पड़ सकता है.
उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों का कहना है कि राज कुमार साहू की यह सफलता कोई तुक्का नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति का नतीजा है.उन्होंने पारंपरिक फसलों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय 'फसल विविधीकरण' यानी क्रॉप डायवर्सिफिकेशन का रास्ता चुना, जिसमें बरबटी और खीरा जैसी नकदी फसलों को शामिल किया गया.विभाग का मानना है कि अगर किसान इसी तरह पारंपरिक खेती के साथ-साथ उद्यानिकी फसलों और आधुनिक प्रबंधन तकनीकों को जोड़ें, तो वे अपनी आमदनी को दोगुना या उससे भी अधिक कर सकते हैं.
राज कुमार साहू की इस उपलब्धि का असर सिर्फ उनके अपने घर तक सीमित नहीं रहा.इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति तो मजबूत हुई ही, साथ ही ग्राम बाम्हनपाली और आसपास के इलाकों के दूसरे किसान भी अब उद्यानिकी फसलों की खेती की तरफ आकर्षित होने लगे हैं.लोग अब उनसे सीधे बात कर उनकी तकनीक और अनुभव को समझने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि वे भी अपनी खेती में यही बदलाव ला सकें.
राज कुमार साहू की यह कहानी छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के छोटे और सीमांत किसानों के लिए एक जीता-जागता उदाहरण है. यह साबित करती है कि जमीन का आकार बड़ा हो या छोटा, अगर विशेषज्ञों की सलाह ली जाए, सरकारी योजनाओं का सही फायदा उठाया जाए और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाए, तो खेती को एक मुनाफे वाला और टिकाऊ व्यवसाय बनाया जा सकता है. राज कुमार साहू का यह सफल प्रयोग आने वाले समय में कई और किसानों की तकदीर बदलने की राह दिखा सकता है.