
महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र में बारिश की लंबी बेरुखी अब किसानों के लिए बड़े संकट में बदलती जा रही है. लगातार 35 से 40 दिनों से पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलें गंभीर नुकसान झेल रही हैं. हालत यह है कि जिन फसलों को किसान अपनी आखिरी उम्मीद मान रहे थे, वही अब खेतों में सूखती नजर आ रही हैं. सूखे जैसे हालात ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है और सरकार से राहत की मांग तेज हो गई है.
पश्चिमी विदर्भ के अकोला जिले के मूर्तिजापुर तालुका में स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बताई जा रही है. यहां करीब 50 गांवों में सोयाबीन की फसल लगभग पूरी तरह प्रभावित हो चुकी है. किसान उद्धवराव राउत के मुताबिक, केवल इस क्षेत्र में ही लगभग 20 हजार किसान सूखे की मार झेल रहे हैं. किसानों ने इस साल अच्छे बाजार भाव की उम्मीद में बड़े पैमाने पर सोयाबीन की बुवाई की थी. जून और जुलाई में हुई शुरुआती बारिश से अच्छी पैदावार की उम्मीद भी बनी थी, लेकिन अगस्त के मध्य से बारिश लगभग गायब हो गई. नतीजतन खेतों में खड़े पौधे पानी के अभाव में सूखने लगे हैं और फलियां तथा पत्तियां झड़ रही हैं.
किसानों का कहना है कि फसल अब उस अवस्था में पहुंच चुकी है, जहां थोड़ी बहुत बारिश भी नुकसान की भरपाई नहीं कर पाएगी. कई खेतों में पौधों की बढ़वार रुक गई है. पौधे सामान्य ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाए हैं और फलियों में दाना भरने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. इससे उत्पादन में भारी गिरावट आने की आशंका है.
मूर्तिजापुर के किसान विलासराव ताथोड का दावा है कि पूरे विदर्भ के पांच और मराठवाड़ा के आठ जिले गंभीर जल संकट से प्रभावित हैं. कुल मिलाकर करीब 14 जिलों में सूखे जैसे हालात बने हुए हैं. इन क्षेत्रों के लगभग 5000 गांवों में खेती पर प्रतिकूल असर पड़ा है.
इन इलाकों की अर्थव्यवस्था काफी हद तक सोयाबीन और कपास पर निर्भर है. ऐसे में दोनों प्रमुख नकदी फसलों का प्रभावित होना किसानों की आय पर सीधा असर डाल सकता है. कई किसानों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो उन्हें इस बार खेती में लागत निकालना भी मुश्किल हो जाएगा.
सूखे की मार झेल रहे किसानों में सरकारी नीतियों को लेकर भी नाराजगी है. किसानों का आरोप है कि पहले यदि 21 दिनों तक पर्याप्त बारिश नहीं होती थी तो प्रशासन को प्रभावित किसानों को राहत देने की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती थी. लेकिन अब नियमों में बदलाव के बाद मुआवजा मिलने की प्रक्रिया कठिन हो गई है.
किसान बाड़ू भगत सेन का कहना है कि पुराने नियम के तहत किसानों को समय पर राहत मिलने की उम्मीद रहती थी, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में प्रभावित किसानों को मुआवजे का लाभ नहीं मिल पा रहा है. किसानों ने राज्य सरकार से मांग की है कि कैबिनेट में फैसला लेकर पुराने नियम को फिर से लागू किया जाए, ताकि सूखे से प्रभावित सोयाबीन और कपास उत्पादकों को राहत मिल सके.
किसानों ने राज्य सरकार की कर्जमाफी योजना पर भी सवाल उठाए हैं. किसान बाड़ू पटेल मते का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में 2019 तक के कर्जों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि उसके बाद लोन लेने वाले कई किसान योजना के दायरे से बाहर हैं. किसानों की मांग है कि 2019 के बाद लिए गए कृषि लोन को भी कर्जमाफी योजना में शामिल किया जाए.
फसल बीमा को लेकर भी किसानों की शिकायतें सामने आ रही हैं. उनका कहना है कि पिछले साल हुए नुकसान का बीमा क्लेम अब तक नहीं मिला है. वहीं फसल क्षति पर प्रति हेक्टेयर 17,500 रुपये मुआवजा देने की घोषणा के बावजूद कई किसानों को अब तक कोई भुगतान नहीं हुआ है.
किसानों ने सरकार को याद दिलाया है कि नियमित लोन चुकाने वाले किसानों को फसल नुकसान की स्थिति में 50 हजार रुपये की सहायता राशि देने का वादा किया गया था. उनका कहना है कि सरकार को पूरी फसल बर्बाद होने का इंतजार नहीं करना चाहिए. यदि जल्द राहत राशि दी जाती है तो किसान अगले सीजन की तैयारी और घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकेंगे.
इस पूरे इलाके के किसानों का कहना है कि सोयाबीन के साथ-साथ विदर्भ की पहचान मानी जाने वाली कपास की फसल भी गंभीर संकट में है. लगातार नमी की कमी से कपास के पौधों की बढ़वार रुक गई है. कई खेतों में पौधों की पत्तियां पीली और लाल पड़ने लगी हैं. स्थानीय किसान इसे "लालिया" जैसी स्थिति बता रहे हैं.
बारिश की कमी के कारण कपास के पौधों पर आने वाले फूल और डोडे समय से पहले झड़ रहे हैं. कई जगह छोटे आकार के डोडे समय से पहले खुलने लगे हैं, जो भविष्य में उत्पादन पर गंभीर असर डाल सकते हैं.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि कपास के डोडों को पर्याप्त नमी नहीं मिलने पर उनमें बनने वाली रुई की क्वालिटी प्रभावित होती है. इससे किसानों को बाजार में कम कीमत मिलने का खतरा रहता है. ऐसे में किसानों को केवल उत्पादन घटने का ही नहीं, बल्कि क्वालिटी खराब होने से कम भाव मिलने का भी नुकसान झेलना पड़ सकता है.
विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान अब आसमान की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं. लेकिन यदि जल्द अच्छी बारिश नहीं होती और सरकार राहत उपायों की घोषणा नहीं करती, तो सोयाबीन और कपास उत्पादक किसानों को इस सीजन में भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है. खेती पर निर्भर हजारों परिवारों के सामने आजीविका का संकट खड़ा होने लगा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक असर पड़ने की आशंका है.