
ओडिशा में 10 सितंबर 2026 के बीच कई इलाकों में हल्की से मध्यम बारिश और कुछ स्थानों पर भारी बारिश होने की संभावना है. मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस अवधि में राज्य के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज हो सकती है. वहीं पूर्वी भारत के भूभाग में कम से मध्यम स्तर तक चक्रवाती सिस्टम बनने की भी संभावना जताई गई है.
मौसम की इस स्थिति को देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों के लिए विशेष एडवाइजरी जारी की है. किसानों को सलाह दी गई है कि खरीफ धान की फसल में पर्याप्त सिंचाई और जल निकासी की व्यवस्था बनाए रखें. खासकर निचले इलाकों में जलभराव रोकने के लिए खेतों से पानी निकालने की उचित व्यवस्था करना जरूरी है.
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि तेज बारिश और आंधी-तूफान के दौरान उर्वरकों, कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों का छिड़काव नहीं किया जाए. बागवानी फसलों, बेल वाली सब्जियों, केले और पपीते जैसे पौधों को सहारा देने की भी सलाह दी गई है ताकि तेज हवाओं और बारिश से नुकसान न हो.
धान की फसल में 2 से 5 सेंटीमीटर तक पानी बनाए रखने की सलाह दी गई है. वहीं निचले क्षेत्रों में लंबे समय तक जलभराव की स्थिति नहीं बनने देनी चाहिए. भारी बारिश के दौरान यूरिया और पौध संरक्षण रसायनों का प्रयोग टालने को कहा गया है.
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को पत्ती झुलसा (लीफ ब्लास्ट), बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट, तना छेदक और लीफ फोल्डर जैसे कीट और रोगों की नियमित निगरानी करने की सलाह दी है. खरपतवार नियंत्रण के लिए हर्बीसाइड का 200 लीटर पानी प्रति एकड़ में घोल बनाकर या 20 किलोग्राम रेत में मिलाकर समान रूप से छिड़काव करने की सिफारिश की गई है.
दलहन फसलों में सूखे की स्थिति बनने पर 50 से 60 मिमी की पूरक सिंचाई देने की सलाह दी गई है. फूल आने और फलियां बनने के समय फसल में नमी की कमी नहीं होने देनी चाहिए.
भिंडी और बैंगन की खेती करने वाले किसानों को भी सूखे के दौरान 50 से 60 मिमी सिंचाई करने और ड्रिप प्रणाली से प्रतिदिन 3 मिमी पानी देने की सलाह दी गई है. साथ ही खेतों में ढलान की दिशा में बेहतर जल निकासी व्यवस्था रखने पर जोर दिया गया है.
गन्ने की फसल में सूखे की स्थिति होने पर नालियों के माध्यम से 50 से 60 मिमी सिंचाई और ड्रिप सिस्टम से प्रतिदिन 4 मिमी पानी देने की सिफारिश की गई है. खेतों में जलभराव न हो, इसके लिए निकासी व्यवस्था मजबूत रखने को कहा गया है.
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि मौसम में तेजी से बदलाव को देखते हुए किसान नियमित रूप से मौसम पूर्वानुमान पर नजर रखें और फसल प्रबंधन से जुड़े उपाय समय पर अपनाएं, ताकि संभावित नुकसान को कम किया जा सके.