
जूट को उसकी सुनहरी चमक और रेशमी बनावट के कारण "गोल्डन फाइबर" यानी स्वर्णिम रेशा कहा जाता है. यह सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि भारत के लाखों किसानों और मजदूरों की आजीविका का महत्वपूर्ण साधन है. पर्यावरण के अनुकूल होने के कारण जूट की मांग दुनिया भर में लगातार बढ़ रही है.
भारत दुनिया में कच्चे जूट का सबसे बड़ा उत्पादक देश है. वैश्विक स्तर पर बनने वाले जूट उत्पादों का करीब 75 प्रतिशत उत्पादन भी भारत में ही होता है. जूट क्षेत्र से लगभग 40 लाख किसान परिवार जुड़े हुए हैं, जबकि संगठित जूट मिलों और अन्य इकाइयों में करीब 3.70 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिलता है.
जूट एक प्राकृतिक फाइबर है जो पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल और रिसाइकिल करने योग्य होता है. यह मजबूत, टिकाऊ और बहुउपयोगी होने के कारण पैकेजिंग, कृषि, निर्माण और औद्योगिक वस्त्रों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है. इसकी नमी सोखने की क्षमता, ताप और आवाज रोकने के गुण इसे कई आधुनिक उत्पादों के लिए भी उपयुक्त बनाते हैं.
प्लास्टिक और सिंथेटिक उत्पादों के विकल्प की तलाश कर रही दुनिया में जूट की उपयोगिता और भी बढ़ गई है. यही वजह है कि इसे भविष्य के टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल फाइबर के रूप में देखा जा रहा है.
पश्चिम बंगाल भारत का सबसे बड़ा जूट उत्पादक राज्य है. इसके बाद बिहार, असम, ओडिशा और झारखंड का स्थान आता है. जूट की बुआई आमतौर पर मार्च और अप्रैल में की जाती है और फसल 100 से 110 दिनों में तैयार हो जाती है.
यह फसल गर्म और नम जलवायु में अच्छी होती है और ज्यादातर खेती बारिश पर निर्भर रहती है. जूट उत्पादन में छोटे और सीमांत किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका है.
दिसंबर 2025 तक देश में 120 कंपोजिट जूट मिलें चल रही थीं, जिनमें अकेले पश्चिम बंगाल में 89 मिलें मौजूद हैं.
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 76 लाख गांठ (बेल) कच्चे जूट का उत्पादन किया. इसी दौरान 12.80 लाख मीट्रिक टन जूट उत्पाद बनाए गए. देश ने 22,700 मीट्रिक टन कच्चे जूट का निर्यात किया, जिसकी कीमत 225.11 करोड़ रुपये रही. वहीं जूट उत्पादों का निर्यात 1.71 लाख मीट्रिक टन रहा, जिसका मूल्य 3,155.27 करोड़ रुपये दर्ज किया गया.
घरेलू बाजार में जूट उत्पादों की मांग भी मजबूत रही. साल 2025-26 में 12.05 लाख मीट्रिक टन जूट उत्पादों की खपत हुई, जो कुल उत्पादन का 94 प्रतिशत हिस्सा है.
जूट किसानों की आय बढ़ाने और उन्हें बाजार में बेहतर दाम दिलाने के लिए सरकार कई कदम उठा रही है. साल 2026-27 के लिए कच्चे जूट का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 5,925 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है. यह उत्पादन लागत पर 61.8 प्रतिशत का लाभ देता है.
गौरतलब है कि 2014-15 में जूट का MSP 2,400 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अब काफी बढ़ चुका है.
जूट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (JCI) MSP व्यवस्था को लागू करने वाली प्रमुख एजेंसी है. जब बाजार भाव MSP से नीचे जाता है, तब JCI अपने खरीद केंद्रों के माध्यम से किसानों से सीधे जूट खरीदकर उन्हें नुकसान से बचाने का काम करती है.
पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय दोनों के लिहाज से जूट भारत के लिए एक महत्वपूर्ण फसल बनी हुई है. बढ़ती वैश्विक मांग और सरकारी समर्थन से आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र के और मजबूत होने की उम्मीद है.