
बिहार में कमजोर मॉनसून और लगातार बनी गर्म और उमस भरे हालातों ने खरीफ सीजन की तैयारियों को प्रभावित कर दिया है. कम बारिश के कारण धान की नर्सरी (बिचड़ा) तैयार करने और रोपाई के काम में देरी हो रही है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के पटना केंद्र ने जुलाई महीने में भी राज्य के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश और सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान जताया है. इसे देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सूखे जैसी स्थिति से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार किसानों को कम अवधि और सूखा-सहनशील धान की किस्में जैसे स्वर्ण श्रेया, सहभागी धान, डीआरआर धान-42, डीआरआर धान-44, नवीन, प्रभात, तुरंता और राजेंद्र श्वेता आदि अपनानी चाहिए. इससे कम बारिश की स्थिति में भी बेहतर उत्पादन मिलने की संभावना रहती है.
जिन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता कम है या जो ऊंची भूमि वाले इलाके हैं, वहां किसानों को धान के बजाय अरहर की खेती करने की सलाह दी गई है. इसके लिए मालवीय-13, आईपीए-203, पूसा-992, यूपीएएस-120 और राजेंद्र अरहर-1 जैसी किस्में उपयुक्त मानी गई हैं. किसानों को बीज की मात्रा 15 से 20 प्रतिशत बढ़ाने और मेड़-नाली पद्धति से बुवाई करने की सलाह दी गई है.
किसान मक्का और रागी जैसी वैकल्पिक फसलों को भी अपना सकते हैं. मक्का की डीकेसी-9081, डीएचएम-117, एचक्यूपीएम-1 और शक्तिमान-4 जैसी सूखा-सहनशील किस्में इस समय लाभदायक साबित हो सकती हैं. जहां सिंचाई या पर्याप्त वर्षा की व्यवस्था है, वहां धान की सीधी बुवाई करने की सलाह दी गई है. बेहतर अंकुरण के लिए बीजों को रातभर पानी में भिगोकर फंगीसाइड और बायोफर्टिलाइजर से उपचारित करने को कहा गया है. साथ ही किसानों को मैट-टाइप या डैपोग नर्सरी तैयार करने और सामुदायिक नर्सरी तैयार करने की भी सलाह दी गई है ताकि रोपाई समय पर पूरी हो सके.
पानी की बचत के लिए कृषि विशेषज्ञों ने 'ऑल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (AWD)' सिंचाई पद्धति अपनाने की सिफारिश की है. इसके तहत खेत में लगातार पानी भरकर रखने के बजाय जरूरत पड़ने पर ही सिंचाई की जाती है. खेत की मेड़ों को मजबूत बनाने और बारिश के पानी को बचाने पर भी जोर दिया गया है.
खाद प्रबंधन के तहत किसानों को एक साथ अधिक मात्रा में यूरिया डालने के बजाय इसे 3-4 बार में देने की सलाह दी गई है. नीम-लेपित यूरिया के उपयोग से पोषक तत्वों की बर्बादी को भी कम किया जा सकता है. खरपतवार नियंत्रण के लिए बुवाई या रोपाई के तुरंत बाद पेंडिमेथालिन और प्रेटिलाक्लोर जैसे खरपतवारनाशियों के प्रयोग की सिफारिश की गई है.
पशुपालकों को भी सावधानी बरतने की सलाह दी गई है. पशुओं को हर समय साफ और ठंडा पेयजल उपलब्ध कराएं और उन्हें छायादार स्थानों पर रखें. पशुशालाओं में उचित वेंटिलेशन की व्यवस्था करें और गर्म हवा वाले हिस्सों में गीली बोरियां लटकाकर तापमान कम रखने का प्रयास करें.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसान समय रहते इन उपायों को अपनाते हैं तो कमजोर मॉनसून और संभावित सूखे के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है.