कृष‍ि क्षेत्र का सबसे संवेदनशील डेटा गायब, साइबर-अटैक हुआ या 'साज‍िश' में ड‍िलीट क‍िया गया र‍िकॉर्ड? 

कृष‍ि क्षेत्र का सबसे संवेदनशील डेटा गायब, साइबर-अटैक हुआ या 'साज‍िश' में ड‍िलीट क‍िया गया र‍िकॉर्ड? 

ICAR controversy: पहले ICAR और कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड का कोर डेटा उड़ा, फ‍िर बैकअप सर्वर से भी गायब हुआ र‍िकॉर्ड. हर भर्ती पर औसतन 15.95 लाख का खर्च, इसके बावजूद कैसे उड़ गया डेटा? अब भर्त‍ियों का नहीं म‍िलेगा र‍िकॉर्ड, कैसे होगी जांच? कृष‍ि मंत्रालय ने की लीपापोती, वेणुगोपाल बदरवाड़ा ने पीएम मोदी को भेज द‍िया पूरे कांड का कच्चा-च‍िट्ठा. 

डेटा ड‍िलीट होने के ख‍िलाफ वेणुगोपाल बदरवाड़ा ने खोला मोर्चा डेटा ड‍िलीट होने के ख‍िलाफ वेणुगोपाल बदरवाड़ा ने खोला मोर्चा
ओम प्रकाश
  • New Delhi ,
  • Nov 29, 2025,
  • Updated Nov 29, 2025, 9:33 AM IST

कृष‍ि क्षेत्र के एक 'कांड' ने 'ड‍िज‍िटल इंड‍िया' के भरोसे को तोड़ द‍िया है. इस कांड में कई तरह के छल-प्रपंच शाम‍िल होने का अंदेशा है. मामला बहुत बड़ा है लेक‍िन कार्रवाई के नाम पर स‍िर्फ 'लीपापोती' करके चुप्पी साध ली गई है. भारतीय कृष‍ि अनुसंधान पर‍िषद (ICAR) और कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड (ASRB) का कोर डेटा उड़ गया है. जिसमें भर्ती, साइंटिस्ट रिकॉर्ड, रिसर्च प्रोजेक्ट, एप्लीकेशन और कम्युनिकेशन से जुड़े बेहद संवेदनशील दस्तावेज शाम‍िल थे. ताज्जुब की बात तो यह है क‍ि द‍िल्ली में डेटा ड‍िलीट होने के कुछ द‍िन बाद हैदराबाद स्थित इसके बैकअप सर्वर (डिजास्टर रिकवरी सेंटर) के भी र‍िकॉर्ड म‍िट गए. आईसीएआर गवर्निंग बॉडी के पूर्व सदस्य वेणुगोपाल बदरवाड़ा का आरोप है क‍ि डेटा अपने आप नहीं उड़ा बल्क‍ि इसे जानबूझकर उड़ाया गया है और इसके पीछे एक बड़ी साज‍िश है. ज‍िसके तार भर्त‍ियों से जुड़े लगते हैं.

मूल रूप से आंध्र प्रदेश के रहने वाले बदरवाड़ा ज़ेबू मवेशियों की नस्लों के संरक्षण और संवर्धन के लिए काम करते हैं. वो इन द‍िनों पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में रहते हैं. आईसीएआर में होने वाली अन‍ियम‍ितताओं पर अक्सर आवाज उठाते रहते हैं. डेटा ड‍िलीट होने वाले कांड के बाद उन्होंने 2014 से ASRB की सभी भर्तियों का पूरा ऑडिट और रिव्यू करने की मांग उठाई है, खासकर उन मामलों की ज‍िन पर केस चल रहे हैं या जिनमें एलिजिबिलिटी छूट दी गई थी.

पीएम को भेजी गई श‍िकायत 

आईसीएआर भारत को भुखमरी से बाहर न‍िकालने वाली संस्था है, जो करीब सौ साल पहले अस्त‍ित्व में आई थी. भारत के कृष‍ि क्षेत्र की इस आधार संस्था और उसके वैज्ञान‍िकों की भर्ती से जुड़ा डेटा उड़ना कोई छोटी बात नहीं है. यह सुरक्षा का भी गंभीर प्रश्न है. यह उस संस्था का हाल है ज‍िसका सालाना बजट लगभग 10 हजार करोड़ रुपये का है. ज‍िस पर भारत के लोगों का पेट भरने के ल‍िए र‍िसर्च करने का काम है. आईसीएआर से लेकर कृष‍ि मंत्रालय तक ने इस पूरे कांड को छ‍िपाने की भरपूर कोश‍िश की, लेक‍िन बदरवाड़ा ने डेटा ड‍िलीट करने के कांड का पूरा कच्चा-च‍िट्ठा प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंचा द‍िया है. हालांक‍ि, इस बारे में जब हमने आईसीएआर के महान‍िदेशक एमएल जाट से पूछा तो उन्होंने कहा, "यह सब बेबुनियाद है और उन्हें (बदरवाड़ा को) ऐसा लिखने की आदत है."

कौन-कौन सा डेटा गायब हुआ? 

द‍िल्ली स्थ‍ित इंडियन एग्रीकल्चरल स्टैटिस्टिक्स रिसर्च इंस्टिट्यूट (IASRI) में ICAR का सेंट्रल डेटा सेंटर है. इस पर अप्रैल 2025 में एक साइबर-अटैक हुआ, जिससे भर्त‍ियों, रिसर्च प्रोजेक्ट, साइंटिस्ट प्रोफाइल, इंटरनल कम्युनिकेशन और जॉब-एप्लीकेशन से जुड़ा जरूरी डेटा मिट गया. बदरवाड़ा ने कहा क‍ि आईसीएआर में कई पदों पर चयन सवालों के घेरे में है. 

कुछ लोगों को पदों पर बैठाने के ल‍िए भर्ती की शर्तें तक बदल दी गईं. ऐसे में लगता है क‍ि जानबूझकर डेटा डिलीट क‍िया गया है, ताक‍ि 'गुनाहों' के सबूत म‍िटाए जा सकें. हालांक‍ि, आईसीएआर के लोग इसे साइबर-अटैक ही बताते हैं. डेटा ड‍िलीट होने के बाद कृष‍ि वैज्ञान‍िकों की चयन प्रक्रिया से जुड़ी सभी डिजिटल फाइलें गायब हो गई हैं. इन फाइलों में एलिजिबिलिटी असेसमेंट, मार्कशीट, इंटरव्यू, इवैल्यूएशन रिपोर्ट और विजिलेंस नोट्स शाम‍िल होते हैं. 

द‍िल्ली से हैदराबाद तक 

प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में बदरवाड़ा ने कहा क‍ि इस डेटा ब्रीच से दिल्ली में मेन सर्वर और हैदराबाद में नेशनल एकेडमी ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च मैनेजमेंट (NAARM) के रेप्लिकेशन सर्वर, दोनों पर असर पड़ा. इंटरनल सोर्स ने कन्फर्म किया है कि गायब डेटा में कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड (ASRB) द्वारा मैनेज किए जाने वाले भर्ती रिकॉर्ड शामिल हैं, जिसमें जूनियर टेक्निकल ऑफिसर से लेकर ड‍िप्टी डायरेक्टर जनरल (DDG) तक के पद भरे गए थे. यही नहीं जॉब एप्लीकेशन, रिसर्च-प्रोजेक्ट डोजियर और ईमेल रिपॉजिटरी भी ड‍िलीट हो गई है. कृष‍ि वैज्ञान‍िकों के ई-मेल का डाटा अब तक र‍िकवर नहीं हो पाया है.

कैसे म‍िलेगा भर्त‍ियों का र‍िकॉर्ड? 

बदरवाड़ा ने कहा क‍ि ICAR डेटा-ब्रीच, भर्ती रिकॉर्ड का मिटाना और डेटा-सेंटर में अचानक कर्मचारियों का फेरबदल, पहली नजर सिस्टम की नाकामी का बड़ा सबूत है. सबूतों का ब्रीच और बाद में उन्हें नष्ट करना असल में एक डिजिटल कवर-अप है जो शायद लंबे समय से आईसीएआर में चल रहे फेवरिटिज्म, नेपोटिज्म और धांधली वाली भर्तियों का जाल हो सकता है.

अब अगर आप भर्त‍ियों का कोई र‍िकॉर्ड मांगेंगे तो वह नहीं म‍िलेगा, क्योंक‍ि उसका डेटा न तो आईसीएआर के द‍िल्ली वाले सर्वर में है और हैदराबाद वाले इसके बैकअप सर्वर में. इसील‍िए बदरवाड़ा इस पूरे मामले में साज‍िश वाला एंगल उछाल रहे हैं. इस डेटा लॉस के बाद पिछली भर्तियों का ऑडिट करने या गड़बड़ियों का पता लगाने की क्षमता बहुत कम हो गई है. ऐसे में बदरवाड़ा ने पीएम नरेंद्र मोदी से मांग की है क‍ि बड़े पब्लिक इंटरेस्ट में भारत की एग्रीकल्चरल रिसर्च को सुरक्षित रखने, मेरिटोक्रेसी को बचाने और अकाउंटेबिलिटी पक्का करने के लिए ASRB को खत्म कर द‍िया जाए. उन्होंने ASRB की जगह एक ट्रांसपेरेंट, सुरक्षित और इंस्टीट्यूशनली अकाउंटेबल भर्ती सिस्टम लाना चाहिए. 

मासूमियत नहीं, सोची-समझी चाल 

आईसीएआर गवर्न‍िंग बॉडी के पूर्व सदस्य ने कहा क‍ि “कुछ लोग दावा करते हैं कि ASRB साफ-सुथरा है, क्योंकि डेटा ड‍िलीट होने के ख‍िलाफ कोई पब्लिक प्रोटेस्ट नहीं है. असल में ‘डेटा ड‍िलीट होने से भर्त‍ियों के रिकॉर्ड खत्म हो गए हैं. चुप्पी डर दिखाती है, ईमानदारी नहीं. पूरे डेटा को चुन-चुनकर डिलीट करना-जिसमें भर्त‍ियों का रिकॉर्ड भी शामिल हैं, यह मासूमियत की निशानी नहीं है, बल्कि सोची-समझी छेड़छाड़ है. इन हालात में, ASRB को बचाए रखना अब समझदारी की बात नहीं है. यह नेशनल एग्रीकल्चरल गवर्नेंस के लिए खतरा है.”

बोर्ड पर खर्च और डेटा का सवाल 

बदरवाड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ल‍िखे पत्र में कहा है कि ICAR और ASRB का मैनिपुलेशन ‘खतरनाक लेवल’ पर पहुंच गया है. पिछले नौ साल में, ASRB ने 1,491 पोस्ट भरी हैं. यानी हर साल औसतन 166 रिक्रूटमेंट. इस बीच, इसका सालाना बजट 26.49 करोड़ रुपये है, जिसका मतलब है कि हर रिक्रूटमेंट पर औसतन 15.95 लाख का खर्च. इसके बावजूद उसका डेटा उड़ गया. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ. इतनी बड़ी फाइनेंशियल बर्बादी और गड़बड़ी को मंजूर नहीं किया जा सकता. कोई दूसरा साइंटिफिक सिस्टम- जैसे CSIR, ICMR, DRDO और ISRO भी अलग रिक्रूटमेंट बोर्ड नहीं रखते, फ‍िर ICAR के ल‍िए ASRB क्यों? 

UPSC के अधीन हो भर्ती 

बदरवाड़ा ने कहा क‍ि भारत के किसान और वैज्ञानिक पारदर्श‍िता, फेयरनेस और इंटीग्रिटी के हकदार हैं. ASRB आज इन तीनों के लिए एक रुकावट है. इसल‍िए इसे खत्म करने से जनता का पैसा बचेगा, मैनिपुलेशन खत्म होगा और ICAR के मिशन में भरोसा वापस आएगा और हमारे रिसर्च गवर्नेंस की सुरक्षा होगी. उन्होंने कृष‍ि वैज्ञान‍िकों की भर्ती को यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (UPSC)  के अधीन करने की मांग उठाई है. साथ ही ICAR के अंदर एक ट्रांसपेरेंट, नियम-बेस्ड कैडर और डेटा-मैनेजमेंट सिस्टम बनाने की मांग की है, जिसमें सख्त डेटा सिक्योरिटी, ऑडिट ट्रेल्स और थर्ड-पार्टी की निगरानी हो.

कार्रवाई के नाम पर लीपापोती 

बहरहाल, इतने बड़े कांड के बाद कुछ लीपापोती तो करनी ही थी. इसल‍िए जुलाई 2025 में, ऐसी घटनाओं को रोकने के उपायों की सिफारिश करने के लिए एक छह सदस्यीय समिति का गठन किया गया था. ज‍िसकी स‍िफार‍िश पर  IASRI के डायरेक्टर को उनका कार्यकाल खत्म होने से तीन दिन पहले हटा दिया. इतना बड़ा कांड और इतनी छोटी सजा कैसे इस स‍िस्टम को ठीक रखने का डर पैदा कर पाएगी. जांच की सिफारिशों के तहत डेटा सेंटर से जुड़े दो प्रिंसिपल साइंटिस्ट को तुरंत ट्रांसफर क‍िया गया. बस हो गया काम पूरा. जनता खुद अंदाजा लगाए क‍ि क्या इतने बड़े मामले की सजा स‍िर्फ ट्रांसफर है? 

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