
भारत प्याज के उत्पादन में सबसे अग्रणी देश है. वही देश के भीतर महाराष्ट्र प्याज उत्पादन में पहले स्थान पर है तो वही मध्य प्रदेश दूसरे स्थान पर काबिज है. खरीफ सीजन में प्याज के भंडारण की उचित व्यवस्था न होने के कारण किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. अधिक नमी, अपर्याप्त वेंटिलेशन और पारंपरिक भंडारण पद्धतियों की सीमाओं के चलते बड़ी मात्रा में प्याज सड़ जाता है या किसानों को औने-पौने दाम पर बेचना पड़ता है.
इसी समस्या का व्यावहारिक समाधान तैयार किया है बांदा कृषि विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक अमित कुमार सिंह ने. उन्होंने ऐसा कम लागत वाला भंडारण मॉडल विकसित किया है, जिसे गांव में उपलब्ध सामग्री से आसानी से तैयार किया जा सकता है.
यह संरचना इस तरह डिजाइन की गई है कि नीचे और किनारों से हवा का संचार बना रहता है, जिससे प्याज में गर्मी और नमी जमा नहीं होती. यही कारण है कि प्याज लंबे समय तक खराब नहीं होता.
बुंदेलखंड क्षेत्र में खरीफ सीजन के दौरान वातावरण में नमी अधिक रहती है. ऐसे में पारंपरिक तरीके से भंडारण करने पर 25–30% तक नुकसान हो जाता है.
अमित कुमार सिंह के अनुसार, विश्वविद्यालय में खरीफ प्याज की 10 उन्नत किस्मों पर शोध कार्य चल रहा है. ये किस्में उत्पादन में बेहतर हैं, लेकिन अधिक नमी के कारण इनके सुरक्षित भंडारण की चुनौती बनी रहती है. इसी जरूरत को ध्यान में रखकर यह मॉडल तैयार किया गया है.
अगर किसान अपनी फसल को 4-5 महीने सुरक्षित रख पाते हैं तो ऑफ-सीजन में उन्हें बेहतर मूल्य मिल सकता है, जिससे आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है.
यह मॉडल विशेष रूप से बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जहां मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियां किसानों के सामने चुनौती बनती हैं. कम लागत, स्थानीय निर्माण और वैज्ञानिक डिजाइन- इन तीन विशेषताओं के कारण यह तकनीक गांव-गांव तक पहुंचने की क्षमता रखती है.
अगर राज्य स्तर पर इसका व्यापक प्रसार किया जाए तो खरीफ प्याज उत्पादक किसानों को भंडारण के कारण होने वाले नुकसान से काफी हद तक राहत मिल सकती है और उनकी आय स्थिर हो सकती है.