Wheat Procurement: सरकारी गोदामों को भरने में पंजाब, हरियाणा,एमपी सबसे आगे, बिहार क्यों है इतना पीछे?

Wheat Procurement: सरकारी गोदामों को भरने में पंजाब, हरियाणा,एमपी सबसे आगे, बिहार क्यों है इतना पीछे?

पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश इस बार भी सरकारी गेहूं खरीद में सबसे आगे हैं, जबकि बिहार काफी पीछे नजर आ रहा है. बिहार में अच्छी उपज होने के बावजूद कमजोर मंडी व्यवस्था, कम खरीद केंद्र और MSP पर सही खरीद न होने से किसान परेशान हैं. जानिए आखिर क्यों सरकारी गोदाम भरने में बिहार पीछे रह जाता है और किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

बिहार में गेहूं खरीद का लक्ष्यबिहार में गेहूं खरीद का लक्ष्य
प्राची वत्स
  • Noida,
  • May 06, 2026,
  • Updated May 06, 2026, 12:37 PM IST

देश में इस समय गेहूं खरीद का सीजन चल रहा है और सरकारी एजेंसियां किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं खरीद रही हैं. हर साल की तरह इस बार भी पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश सरकारी खरीद में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं. पंजाब की अगर बात करें तो यहां समय से पहले ही 122 लाख मीट्रिक टन तय किया गया है. जिसमें से 4 मई तक, राज्य में लगभग 115 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं की खरीद हो चुकी है. वहीं दूसरी ओर बिहार जैसे बड़े कृषि राज्य में सरकारी खरीद का आंकड़ा बेहद कम है. सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार सरकारी खरीद में इतना पीछे क्यों है, जबकि वहां भी बड़े पैमाने पर खेती होती है.

पंजाब, हरियाणा और एमपी में रिकॉर्ड खरीद

देश के कुल गेहूं उत्पादन और सरकारी खरीद में पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी हिस्सेदारी रहती है. इन राज्यों में किसानों को मंडियों की अच्छी सुविधा मिलती है और सरकारी खरीद व्यवस्था भी मजबूत है.

पिछले साल यानी 2025 में पंजाब में लगभग 130 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूं की सरकारी खरीद हुई थी. हरियाणा में यह आंकड़ा करीब 75 लाख मीट्रिक टन रहा, जबकि मध्य प्रदेश में 80 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा गेहूं खरीदा गया. इन तीनों राज्यों ने मिलकर केंद्र के गोदाम भरने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई.

इस साल भी सरकार ने इन राज्यों में बड़े लक्ष्य तय किए हैं.

  • पंजाब में करीब 132 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य रखा गया है.
  • हरियाणा में लगभग 75 लाख मीट्रिक टन खरीद का लक्ष्य है.
  • मध्य प्रदेश में करीब 85 लाख मीट्रिक टन गेहूं खरीदने का लक्ष्य तय किया गया है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक इन राज्यों में बड़ी मात्रा में खरीद हो चुकी है और कई जिलों में लक्ष्य के करीब पहुंचने की स्थिति बन गई है.

बिहार में क्यों कम होती है सरकारी खरीद?

अगर बिहार की बात करें तो यहां गेहूं की कुल उपज लगभग 60 से 70 लाख मीट्रिक टन के बीच रहती है. वहीं राज्य में गेहूं की खपत भी लगभग 50 से 60 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है. यानी जो गेहूं बिहार में पैदा होता है, उसका बड़ा हिस्सा राज्य के लोग खुद उपभोग में इस्तेमाल कर लेते हैं. यही वजह है कि यहां सरकार खरीद का लक्ष्य भी कम रखती है.

लेकिन केवल यही एक कारण नहीं है. बिहार में सरकारी खरीद कम होने के पीछे सबसे बड़ी वजह मंडी व्यवस्था का कमजोर होना माना जाता है.

बिहार में मंडी व्यवस्था खत्म होने का असर

बिहार में साल 2006 में एपीएमसी (MSP) मंडी व्यवस्था को खत्म कर दिया गया था. सरकार का मानना था कि मंडी समाप्त होने से निजी निवेश बढ़ेगा और किसान सीधे व्यापारियों को फसल बेच सकेंगे. लेकिन इसका फायदा किसानों को ज्यादा नहीं मिल पाया.

मंडी खत्म होने के बाद किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए संगठित बाजार नहीं मिला. आज भी बिहार के ज्यादातर किसान गांवों में ही स्थानीय व्यापारियों या बिचौलियों को गेहूं बेचने को मजबूर हैं. कई बार किसानों को MSP से कम कीमत पर फसल बेचनी पड़ती है.

किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है?

बिहार के किसानों को सरकारी खरीद में कई तरह की परेशानियां झेलनी पड़ती हैं.

  • गांव के पास खरीद केंद्र नहीं होने से किसानों को दूर जाना पड़ता है.
  • कई जगहों पर खरीद प्रक्रिया देर से शुरू होती है.
  • ऑनलाइन पंजीकरण और दस्तावेजी प्रक्रिया छोटे किसानों के लिए मुश्किल बन जाती है.
  • भंडारण और परिवहन की सुविधा कमजोर होने के कारण किसान जल्दी फसल बेचने को मजबूर हो जाते हैं.
  • बिचौलियों का दबदबा होने से किसानों को सही कीमत नहीं मिल पाती.

यही कारण है कि बिहार में बड़ी मात्रा में गेहूं खुले बाजार में चला जाता है और सरकारी गोदामों तक कम पहुंच पाता है.

पंजाब-हरियाणा मॉडल क्यों सफल?

पंजाब और हरियाणा में दशकों से मजबूत मंडी नेटवर्क बना हुआ है. गांव-गांव के पास खरीद केंद्र मौजूद हैं. किसानों को फसल बेचने में ज्यादा परेशानी नहीं होती और भुगतान भी जल्दी मिल जाता है. यही वजह है कि इन राज्यों के किसान बड़ी मात्रा में सीधे सरकारी एजेंसियों को गेहूं बेचते हैं.

मध्य प्रदेश ने भी पिछले कुछ वर्षों में खरीद व्यवस्था को मजबूत किया है. वहां किसानों का पंजीकरण, बोनस और समय पर भुगतान जैसी सुविधाओं ने सरकारी खरीद बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाई है.

क्या बिहार में सुधार संभव है?

कृषि जानकारों के मुताबिक अगर बिहार में दोबारा मजबूत कृषि बाजार व्यवस्था तैयार की जाए, खरीद केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए और किसानों को MSP पर खरीद की गारंटी मिले, तो राज्य में सरकारी खरीद का आंकड़ा काफी बढ़ सकता है. इससे किसानों को बेहतर दाम मिलेगा और सरकार को भी भंडारण में मदद मिलेगी.

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