
अगर आप अरबी की खेती करते हैं और ऐसी किस्म चाहते हैं, जो कम समय में तैयार हो, अच्छी पैदावार दे और रोग का असर भी कम हो, तो ‘श्री हीरा’ आपके लिए एक अच्छा विकल्प हो सकती है. इस किस्म को ICAR-केन्द्रीय कंद फसल अनुसंधान संस्थान (ICAR-Central Tuber Crops Research Institute), तिरुवनंतपुरम ने विकसित किया है. इस किस्म की खास बात यह है कि यह करीब 180 दिन में तैयार हो जाती है और अच्छी परिस्थितियों में 16 से 20 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज दे सकती है.
अरबी की खेती में किसानों के लिए फसल का जल्दी तैयार होना काफी फायदेमंद होता है. श्री हीरा एक कम अवधि वाली किस्म है, जिसे तैयार होने में लगभग 180 दिन लगते हैं. यानी किसान करीब 6 महीने में इसकी फसल ले सकते हैं. कम समय में फसल तैयार होने से किसान अपनी जमीन पर अगली फसल की योजना भी आसानी से बना सकते हैं.
‘श्री हीरा’ किस्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी अच्छी पैदावार है. इससे 16 से 20 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज मिल सकती है. हालांकि वास्तविक उत्पादन मिट्टी, मौसम, पानी, खाद और खेती के तरीके पर निर्भर करेगा. अगर किसान फसल की सही देखभाल करते हैं, तो यह किस्म अच्छी आमदनी का जरिया बन सकती है.
‘श्री हीरा’ में एक और खास गुण है. इसमें एक पौधे के नीचे 12 से 16 कंद यानी कॉर्मेल्स बन सकते हैं. ज्यादा कंद बनने से एक पौधे से मिलने वाली उपज अच्छी हो सकती है. यही वजह है कि यह किस्म अरबी की खेती करने वाले किसानों के लिए उपयोगी मानी जा सकती है.
अरबी की फसल में पत्ती झुलसा रोग किसानों के लिए परेशानी का कारण बन सकता है. इस रोग से पौधे की पत्तियां प्रभावित होती हैं और फसल की बढ़वार पर भी असर पड़ सकता है. ‘श्री हीरा’ किस्म की खासियत है कि यह पत्ती झुलसा रोग के प्रति सहनशील है. इसका मतलब है कि इस किस्म पर इस रोग का असर दूसरी संवेदनशील किस्मों की तुलना में कम हो सकता है.
‘श्री हीरा’ को खास तौर पर बारानी यानी बारिश पर निर्भर खेती के लिए भी उपयुक्त बताया गया है. इसके अलावा इसे ऊंची और नीची जमीन दोनों जगह उगाया जा सकता है. ओडिशा के मध्यम और निचले क्षेत्रों की परिस्थितियों के लिए भी यह किस्म उपयुक्त है. इससे उन किसानों को फायदा हो सकता है, जिनके पास सिंचाई की सुविधा सीमित है.
इस किस्म में अम्लता यानी खट्टापन कम पाया जाता है. यह गुण इसे दूसरी किस्मों से अलग बनाता है. अरबी की गुणवत्ता और उपयोग के लिहाज से कम खट्टापन को एक अच्छा गुण माना जाता है.
ओडिशा में अलग-अलग तरह की जमीन और खेती की परिस्थितियां देखने को मिलती हैं. कई किसान बारिश पर निर्भर रहते हैं. ऐसे में ‘श्री हीरा’ जैसी किस्म, जो बारानी, ऊंची और निचली जमीन में उगाई जा सकती है, किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है. इसकी कम अवधि, अच्छी उपज और पत्ती झुलसा रोग के प्रति सहनशीलता इसे खास बनाती है.
कुल मिलाकर अरबी की ‘श्री हीरा’ किस्म में कई ऐसे गुण हैं, जो इसे किसानों के लिए आकर्षक बनाते हैं. करीब 180 दिन में तैयार होने वाली यह किस्म 16-20 टन प्रति हेक्टेयर तक उपज, एक पौधे में 12-16 कंद और पत्ती झुलसा रोग के प्रति सहनशीलता जैसी खूबियों के लिए जानी जाती है. खासकर ओडिशा के बारिश पर निर्भर और अलग-अलग ऊंचाई वाले खेतों में यह किस्म किसानों के लिए एक अच्छा विकल्प बन सकती है.
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