हिमाचल में मौसम ने बिगाड़ा सेब का खेल! उत्पादन में भारी गिरावट से बागवानों की बढ़ी चिंता

हिमाचल में मौसम ने बिगाड़ा सेब का खेल! उत्पादन में भारी गिरावट से बागवानों की बढ़ी चिंता

हिमाचल प्रदेश में इस बार सेब किसानों के लिए सीजन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है. मौसम की मार से कई इलाकों में फसल काफी कम हुई है, जबकि मजदूरी, खाद, कीटनाशक, पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट का खर्च बढ़ गया है.

क‍िसान तक
  • Noida,
  • Aug 30, 2026,
  • Updated Aug 30, 2026, 12:20 PM IST

हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक इस साल मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. मौसम की मार से कई इलाकों में सेब की फसल काफी कम हुई है. इसके साथ ही मजदूरी, खाद, कीटनाशक, पैकेजिंग और परिवहन जैसी लागत बढ़ने से किसानों की चिंता और बढ़ गई है. हालांकि, अच्छी क्वालिटी के सेब को शिमला की ढल्ली मंडी में 20 किलो के बॉक्स पर करीब 3,000 से 3,500 रुपये तक का भाव मिल रहा है. किसानों का कहना है कि यह भाव फिलहाल ठीक है, लेकिन बढ़ती लागत को देखते हुए स्थिर और बेहतर कीमत की जरूरत है.

फूल आने के समय मौसम ने बिगाड़ा खेल

किसानों के मुताबिक, इस साल सेब के पेड़ों पर फूल आने के दौरान मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिला. कई जगह बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और ठंड ने फूलों को नुकसान पहुंचाया. इसका सीधा असर फल लगने पर पड़ा. निचले और मध्यम ऊंचाई वाले क्षेत्रों में इसका असर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है. शिमला जिले के रत्नारी गांव के किसान दौलत राम ने बताया कि शुरुआत में फसल अच्छी होने की उम्मीद थी, लेकिन फूल आने के समय मौसम खराब हो गया. कहीं ठंड पड़ी, तो कहीं बारिश और ओलावृष्टि हुई. इससे कई जगह फूल खराब हो गए और फल कम लगे. उन्होंने बताया कि कुछ इलाकों में फसल ठीक है, जबकि कई बागों में बहुत कम फल आए हैं.

अच्छे सेब को 3,000-3,500 रुपये तक भाव

दौलत राम के मुताबिक अभी अच्छी क्वालिटी के सेब के लिए किसानों को 20 किलो के बॉक्स पर करीब 3,000 से 3,500 रुपये तक मिल रहे हैं. उन्होंने इस भाव को संतोषजनक बताया, लेकिन कहा कि किसान की कमाई का हिसाब सिर्फ मंडी भाव से नहीं लगाया जा सकता. किसानों को पूरे साल मजदूरी, दवाइयों, खाद, कार्टन, परिवहन और बागवानी से जुड़े दूसरे खर्च उठाने पड़ते हैं. ऐसे में अगर कीमत स्थिर नहीं रहती तो अच्छी फसल के बावजूद मुनाफा कम रह जाता है.

छोटे किसानों की बढ़ी परेशानी

किसानों ने सरकार की मार्केट इंटरवेंशन स्कीम (MIS) के तहत भुगतान में देरी का मुद्दा भी उठाया. दौलत राम का कहना है कि कुछ छोटे किसान अभी भी पिछले सीजन के भुगतान का इंतजार कर रहे हैं. उनका दावा है कि कुछ मामलों में भुगतान कई साल से लंबित है. किसानों का कहना है कि बड़े बागवानों के मुकाबले छोटे किसानों के पास संसाधन और मोल भाव करने की ताकत कम होती है, इसलिए उन्हें समय पर भुगतान और बाजार में उचित कीमत मिलने की ज्यादा जरूरत है.

कई इलाकों में फसल बेहद कम

एक अन्य सेब उत्पादक रमेश चौहान ने बताया कि इस साल निचले और मध्यम इलाकों में फसल की स्थिति बेहद खराब है. ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भी कई बागों में उत्पादन कम हुआ है. उन्होंने कहा कि मंडियों में सेब की आवक कम है, लेकिन हर क्वालिटी के सेब को उम्मीद के मुताबिक भाव नहीं मिल रहा. ढल्ली मंडी में इस समय सेब के भाव क्वालिटी के हिसाब से करीब 700-800 रुपये से लेकर 3,000 रुपये या उससे अधिक प्रति बॉक्स तक बताए जा रहे हैं. प्रीमियम क्वालिटी के सेबों को बेहतर कीमत मिल रही है, जबकि छोटे और कम क्वालिटी वाले सेबों की मांग कमजोर है.

बढ़ती लागत ने कम किया मुनाफा

किसानों का कहना है कि कीटनाशक, खाद, मजदूरी और कार्टन समेत लगभग हर जरूरी चीज महंगी हो गई है. ऐसे में कम उत्पादन और बढ़ी लागत ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं. कुछ किसानों का कहना है कि निचले इलाकों में कई उत्पादक दवाइयों और बागवानी पर किया गया खर्च भी पूरी तरह नहीं निकाल पा रहे हैं. किसानों ने सरकार से घरेलू सेब को बाजार में बेहतर सुरक्षा देने और बाहर से आने वाले सेब के मुकाबले स्थानीय उत्पादकों के हितों का ध्यान रखने की मांग की है.

व्यापारियों की भी अलग समस्या

जहां किसान अच्छे और स्थिर भाव की मांग कर रहे हैं, वहीं व्यापारियों का कहना है कि ऊंचे खरीद भाव के बावजूद उन्हें मुनाफा नहीं हो रहा है. शिमला के व्यापारी ब्रिज लाल, जो पिछले करीब 10-15 साल से सेब कारोबार से जुड़े हैं, उन्होंने बताया कि पिछले साल अच्छी क्वालिटी का सेब करीब 1,800-2,000 रुपये प्रति बॉक्स बिक रहा था, जबकि इस साल यही भाव बढ़कर करीब 2,800-3,000 रुपये तक पहुंच गया है.

हालांकि, उनका कहना है कि बाहर के बाजारों में मांग उतनी मजबूत नहीं है. उत्तर प्रदेश जैसे बाजारों में महंगे सेब को बेचने में परेशानी हो रही है. इसके अलावा कश्मीर के सेब की आवक से भी बाजार पर असर पड़ रहा है. व्यापारियों के मुताबिक इस साल सेब का आकार भी कई इलाकों में छोटा रह गया है. छोटे आकार के सेब को स्थानीय तौर पर 'पिट्टू' कहा जाता है और इन्हें बेहतर भाव नहीं मिल पाता. इस वजह से किसानों के साथ-साथ व्यापारियों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है. (ANI)

MORE NEWS

Read more!