
जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसी मौसमीय परिस्थितियों के कारण खेती लगातार चुनौतीपूर्ण होती जा रही है.वर्षा में अनिश्चितता, सूखे की आशंका और सिंचाई संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए कोदो और कुटकी जैसी पारंपरिक मिलेट फसलें एक भरोसेमंद विकल्प बनकर उभर रही हैं. कम पानी, कम लागत और कम उर्वरक की आवश्यकता वाली ये फसलें न केवल किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर रही हैं, बल्कि पोषण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.
छत्तीसगढ़ की समृद्ध कृषि परंपरा में कोदो और कुटकी का विशेष स्थान रहा है.सदियों से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के भोजन का हिस्सा रही ये फसलें आज बदलते मौसम और खेती की चुनौतियों के बीच फिर से केंद्र में आ गई हैं.विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में अल नीनो के प्रभाव से वर्षा कम होती है या मौसम में असामान्य बदलाव आते हैं, तो कोदो-कुटकी जैसी फसलें किसानों को नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं.
कोदो (पास्पलम स्क्रोबिकुलेटम) और कुटकी (पैनिकम सुमाट्रेंस) की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हें धान जैसी फसलों की तुलना में बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है.कम उपजाऊ, पथरीली और ढालू भूमि में भी इनकी सफल खेती की जा सकती है। यही कारण है कि सूखा प्रभावित और वर्षा आधारित क्षेत्रों के किसानों के लिए ये फसलें वरदान साबित हो रही हैं.
विशेषज्ञों के अनुसार इन फसलों को कम रासायनिक उर्वरकों और कम कृषि लागत में उगाया जा सकता है, जिससे किसानों की उत्पादन लागत घटती है और लाभ बढ़ता है.
देश और दुनिया में मिलेट आधारित खाद्य उत्पादों की बढ़ती मांग ने कोदो और कुटकी के व्यावसायिक महत्व को काफी बढ़ा दिया है.स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता इन अनाजों को तेजी से अपना रहे हैं, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिल रहा है.
वर्ष 2026 में कोदो का न्यूनतम समर्थन मूल्य 3,200 रुपये प्रति क्विंटल तथा कुटकी का 3,350 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है. इससे किसानों का इन फसलों की ओर रुझान बढ़ा है और इनके रकबे में विस्तार की संभावनाएं मजबूत हुई हैं.
कोदो और कुटकी केवल किसानों की आय बढ़ाने वाली फसलें ही नहीं हैं, बल्कि पोषण सुरक्षा का भी मजबूत आधार हैं. कोदो में प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम और जटिल कार्बोहाइड्रेट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जबकि कुटकी फाइबर, प्रोटीन, फास्फोरस और अन्य खनिज तत्वों से भरपूर होती है.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनका नियमित सेवन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और एनीमिया जैसी समस्याओं के नियंत्रण में सहायक हो सकता है.यही कारण है कि आज इन्हें सुपर फूड के रूप में पहचान मिल रही है.
कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाकर कोदो-कुटकी की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि की जा सकती है. मानसून की शुरुआत के साथ जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक बुवाई, बीजोपचार, कतार पद्धति, संतुलित पोषण प्रबंधन और समय पर खरपतवार नियंत्रण से बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.
मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने भी किसानों से धान के साथ-साथ कोदो, कुटकी और रागी जैसी मिलेट फसलों का उत्पादन बढ़ाने की अपील की है. उनका मानना है कि ये फसलें किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ प्रदेश को पोषण सुरक्षा और जल संरक्षण की दिशा में भी मजबूत बनाएंगी.
अल नीनो, जलवायु परिवर्तन और जल संकट जैसी चुनौतियों के बीच कोदो और कुटकी केवल पारंपरिक फसलें नहीं रह गई हैं, बल्कि भविष्य की टिकाऊ खेती का मजबूत आधार बनती जा रही हैं. कम पानी, कम लागत, बेहतर बाजार मूल्य और उच्च पोषण गुणों के कारण ये फसलें किसानों की आर्थिक समृद्धि और खाद्य सुरक्षा दोनों की गारंटी बन सकती हैं.
ऐसे समय में जब खेती को जलवायु अनुकूल बनाने की जरूरत बढ़ रही है, कोदो और कुटकी जैसी मिलेट फसलें छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए नई उम्मीद और नएअवसर लेकर सामने आ रही हैं.