कमजोर मॉनसून के बीच किसानों का दांव: मूंगफली पर बढ़ा भरोसा, जोखिम के बावजूद ज्यादा रकबा

कमजोर मॉनसून के बीच किसानों का दांव: मूंगफली पर बढ़ा भरोसा, जोखिम के बावजूद ज्यादा रकबा

राजस्थान के नागौर जिले में कमजोर मॉनसून के बावजूद किसान मूंगफली की खेती पर ज्यादा भरोसा जता रहे हैं. अधिक पानी की जरूरत और जोखिम के बावजूद, बेहतर बाजार कीमत, तेल की मांग और चारे के उपयोग के कारण किसान मूंगफली का रकबा बढ़ा रहे हैं. वहीं, सरकारी आंकड़ों में इस साल तिलहन फसलों के रकबे में गिरावट भी दर्ज की गई है, जो खेती के बदलते रुझान को दर्शाता है.

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कमजोर मॉनसून के बीच किसानों का दांव: मूंगफली पर बढ़ा भरोसा, जोखिम के बावजूद ज्यादा रकबाराजस्थान में मूंगफली का रकबा बढ़ा

राजस्थान के नागौर जिले के धमनिया गांव के 54 साल के किसान बुधराम ने इस खरीफ सीजन में अपनी छह हेक्टेयर जमीन पर बारिश पर निर्भर तीन फसलें बोई हैं – मूंगफली, मूंग और बाजरा. इनमें से मूंगफली तीन हेक्टेयर में, मूंग दो हेक्टेयर में और बाजरा बाकी एक हेक्टेयर में बोई गई है. पश्चिमी विक्षोभ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) के कारण हुई मॉनसून-पूर्व बारिश का फायदा उठाते हुए तीनों फसलें जून में समय पर बोई गई थीं.

अब, सिंचाई का कोई साधन न होने के कारण, बुधराम बेसब्री से दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के समय पर आने का इंतजार कर रहे हैं. मूंगफली, जो उनकी जमीन के सबसे बड़े हिस्से पर लगी है, उनकी बोई गई तीनों फसलों में सबसे ज्यादा पानी मांगने वाली फसल भी है.

जोखिम के बावजूद, उन्होंने मूंगफली का रकबा बढ़ाने का फैसला किया. उन्होंने PTI को बताया, "कम बारिश के कारण पैदावार कम होने पर भी, यह दूसरी दो फसलों की तुलना में ज्यादा फायदा देती है."

मूंग के मुकाबले मूंगफली से अधिक कमाई

बुधराम ने कहा, "मूंगफली से मूंग के मुकाबले ज्यादा कमाई होती है. एक हेक्टेयर में मुझे 10 क्विंटल पैदावार मिलती है. इसकी फसल के अवशेष (चारा और छिलके) बहुत पौष्टिक होते हैं और जानवरों के चारे के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं."

इसके उलट, मूंग कम पानी में भी उग सकती है, लेकिन अक्सर इसकी उपज काली पड़ जाती है और पैदावार पर असर पड़ता है.

उसी जिले के बालावास गांव के 50 साल के सुखराम ने भी बड़े पैमाने पर ऐसा ही हिसाब-किताब किया है. इस खरीफ़ सीजन में उन्होंने जितनी जमीन (12-13 हेक्टेयर) पर बुआई की है, उसमें से सात हेक्टेयर में मूंगफली, तीन में मूंग और दो में बाजरा और ग्वार बोई गई है. उन्होंने भी इस साल कमजोर मॉनसून की आशंका के बावजूद मूंगफली का रकबा ज्यादा रखने का फैसला किया.

उन्होंने कहा, "तीनों फसलों में, मजबूत बाजार मांग, खाने के तेल की ज्यादा कीमत और सरकारी समर्थन के कारण मूंगफली आम तौर पर सबसे ज्यादा और सबसे स्थिर आर्थिक फायदा देती है." उन्होंने आगे कहा कि भले ही मूंगफली के लिए ज्यादा मज़दूरी की जरूरत होती है, लेकिन इसकी पैदावार दूसरी फसलों के मुकाबले ज्यादा होती है.

राजस्थान में मूंगफली का बंपर उत्पादन

राजस्थान में मूंगफली के प्रति दिलचस्पी की खबर ऐसे समय में सामने आई है जब खरीफ सीजन में इसकी बुवाई में गिरावट दर्ज की गई है. कृषि मंत्रालय का हालिया आंकड़ा बताता है कि तिलहन फसलों में, मूंगफली का रकबा 15.29 लाख हेक्टेयर से घटकर 8.87 लाख हेक्टेयर और सोयाबीन का रकबा 19.97 लाख हेक्टेयर से घटकर 6.92 लाख हेक्टेयर रह गया है.

राजस्थान देश का दूसरा सबसे बड़ा मूंगफली उत्पादक राज्य है, जहां उत्पादन के 32 लाख टन तक पहुंचने का अनुमान है. मुख्य रूप से खरीफ (मॉनसून) के मौसम में उगाई जाने वाली यह फसल पश्चिमी इलाकों की सूखी, रेतीली मिट्टी में अच्छी तरह पनपती है, जिससे बीकानेर सबसे बड़ा उत्पादक जिला और लूनकरनसर इलाका "राजस्थान का राजकोट" बन गया है.

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